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मध्यकालीन भारत का इतिहास - भक्ति एवं सूफी आंदोलन Part -3 (मीरा बाई, तुलसीदास, सूरदास एवं वल्लभाचार्य ,दादूदयाल, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता एवं शंकरदेव )
मध्यकालीन भारत का इतिहास - भक्ति एवं सूफी आंदोलन Part -3 (मीरा बाई, तुलसीदास, सूरदास एवं वल्लभाचार्य ,दादूदयाल, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता एवं शंकरदेव )
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| मध्यकालीन भारत का इतिहास - भक्ति एवं सूफी आंदोलन Part -3 (मीरा बाई, तुलसीदास, सूरदास एवं वल्लभाचार्य ,दादूदयाल, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता एवं शंकरदेव ) |
मीरा बाई, तुलसीदास, सूरदास एवं वल्लभाचार्य
🕉️ मीरा बाई
- जन्म – 1498 ई., कुड़की (पाली, राजस्थान)
- बचपन का नाम – पेमल दे
- पिता – राजा रतनसिंह
- पति – भोजराज (राणा सांगा के पुत्र)
- विवाह – 1516 ई.
भक्ति व जीवन
- भक्तिकाल की महान महिला संत
- तुलना – सूफी महिला संत राबिया से
- प्रथम गुरु – जीवस्वामी (चैतन्य सम्प्रदाय)
- बाद में आध्यात्मिक गुरु – रैदास / रविदास
- पति की मृत्यु के बाद कृष्ण भक्ति में पूर्णतः लीन
- कृष्ण को पति (प्रियतम) माना
- भक्ति का स्वरूप – माधुर्य एवं कांत भाव
साहित्य
- भक्ति गीत – पदावली
- भाषा – राजस्थानी मिश्रित ब्रज
- रस – वियोग श्रृंगार एवं शान्त
अंत
- द्वारिका में रणछोड़ाय मंदिर में विलीन (किंवदंती)
प्रमुख ग्रंथ
- नरसी जी रो मायरो
- गीत गोविन्द की टीका
- राग गोविन्द
- मीरा बाई का मल्हार
- राग सोरठा
- सत्यभामा रो रूसणो
- रुक्मणी मंगल
🕉️ तुलसीदास
- जन्म – 1511 / 1532 ई.
- जन्म स्थान – राजापुर (वर्तमान कासगंज, उ.प्र.)
- पिता – आत्माराम दुबे
- माता – हुलसी देवी
- पत्नी – रत्नावली
- गुरु – नरहरिदास (अयोध्या)
- बचपन का नाम – रामबोला
- समकालीन – अकबर
प्रमुख कृति
- रामचरितमानस –
- भाषा – अवधी
- रचना वर्ष – 1574 ई. (वि.सं. 1631)
- रचना काल – 2 वर्ष 9 माह 26 दिन
- अन्य नाम – तुलसी रामायण
- श्लोक – 10902
- संसार के सर्वश्रेष्ठ 100 ग्रंथों में 46वाँ स्थान
कांड (7)
- बालकाण्ड (सबसे बड़ा)
- अयोध्याकाण्ड
- अरण्यकाण्ड
- किष्किंधा (सबसे छोटा)
- सुन्दरकाण्ड
- लंकाकाण्ड / युद्धकाण्ड
- उत्तरकाण्ड
उपाधि व दर्शन
- “अभिनव वाल्मीकि”
- दर्शन – विशिष्टाद्वैत
मृत्यु
- अस्सी घाट, काशी
- तुलसीदास मंदिर – काँच मंदिर (चित्रकूट)
प्रमुख ग्रंथ
- रामाज्ञा प्रश्न
- वैराग्य संदीपनी
- दोहावली
- कवितावली
- कृष्ण गीतावली
- गीतावली
- पार्वती मंगल
- जानकी मंगल
- रामलला नहछू
- बरवै रामायण
- हनुमान बाहुक
- विनयपत्रिका (अंतिम ग्रंथ)
🕉️ सूरदास
- जन्म – 1478 ई.
- जन्म स्थान – रूकनाता (आगरा)
- निवास – आगरा-मथुरा मार्ग पर सीही गाँव
- पिता – रामदास
- बचपन का नाम – मदनमोहन
भक्ति
- श्रीकृष्ण के सगुण भक्त
- हिन्दी साहित्य के सूर्य माने जाते हैं
- सम्पूर्ण काव्य – ब्रज भाषा
प्रमुख ग्रंथ
- सूरसागर (सबसे प्रसिद्ध – अकबर काल)
- सूरसारावली
- साहित्य लहरी
अन्य तथ्य
- समकालीन – अकबर एवं जहाँगीर
- मृत्यु – 1583 ई., पारसौली (गोवर्धन, उ.प्र.)
- विठ्ठलनाथ का कथन –
“पुष्टि मार्ग को जहाज जात है…”
🕉️ वल्लभाचार्य
- जन्म – 1479–1531 ई.
- मूल स्थान – तेलंगाना (ब्राह्मण परिवार)
- पिता – लक्ष्मणभट्ट
- माता – इल्लमा देवी
- शिक्षा – काशी
मत / दर्शन
- शुद्धाद्वैतवाद
ऐतिहासिक संदर्भ
- समकालीन – विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय
कृष्णदेवराय के समय ग्रंथ –
- सुबोधिनी
- सिद्धान्त रहस्य
भक्ति परंपरा
- बाल कृष्ण की पूजा
- श्रीनाथजी के रूप में उपासना
- वृंदावन में श्रीनाथजी का मंदिर
- औरंगजेब (1668) के आदेश पर मूर्ति हटाई गई
- मूर्ति – उदयपुर → नाथद्वारा (राजसमंद)
संप्रदाय
- रुद्र सम्प्रदाय (प्रवर्तक – विष्णु स्वामी)
- पुष्टिमार्ग के अनुयायी
वल्लभाचार्य के उत्तराधिकारी
- पुत्र – विठ्ठलनाथ
- अकबर ने गोकुल व जैतपुरा की जागीरें दीं
- अष्टछाप मण्डली (1565 ई.)
अष्टछाप कवि
- कुंभनदास
- गोविन्दस्वामी
- सूरदास
- छीतस्वामी
- परमानन्द दास
- चतुर्भुज दास
- कृष्णदास
- नन्ददास
दादूदयाल, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु, नरसी मेहता एवं शंकरदेव
- जन्म – 1544 ई., अहमदाबाद (साबरमती नदी तट)
- मृत्यु – 1603 ई., नरैना (जयपुर)
- पालक पिता – लोदीराम (ब्राह्मण)
- गुरु – बुड्ढन / ब्रह्मानंद (कबीर के प्रमुख शिष्य)
- उपाधि – राजस्थान का कबीर
दादूपंथ
- स्थापना – 1554 ई., नरैना (जयपुर)
- प्रधान पीठ – नरैना
- मूर्तिपूजा व जाति प्रथा का विरोध
शाखाएँ
- खालसा
- नागा
- खाकी
- उत्तरादे
- विरक्त
उपदेश एवं ग्रंथ
- दादू रा दूहा
- दादूवाणी – लगभग 5000 श्लोक
- भाषा – ढूँढाड़ी एवं सधुक्कड़ी (पश्चिमी हिन्दी)
अन्य तथ्य
- सत्संग स्थल – अलख दरीबा
- 52 शिष्य – 52 स्तम्भ
- प्रमुख शिष्य – सुन्दरदास, गरीबदास, रज्जब, मिस्किनदास, बालिन्द, बखना
- रज्जब का कथन – “यह संसार वेद है, यह सृष्टि कुरान है।”
- अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी आमंत्रण
- अकबर ने इनके प्रभाव से गौहत्या पर रोक लगाई
🕉️ गुरु नानक
- जन्म – 1469 ई.
- जन्म स्थान – तलवण्डी (ननकाना साहिब, पंजाब)
- पिता – मेहता कालुजी
- माता – तृप्ता देवी
- पत्नी – सुलखनादेवी
भक्ति विचार
- निर्गुण भक्ति धारा
- जाति-पात में विश्वास नहीं
- ईश्वर – अकाल पुरुष
संगीत व उपदेश
- शिष्य – मरदाना (सारंगी वादक)
- स्वयं रबाब के साथ भजन
यात्राएँ (उदासियाँ)
- भारत, अफगानिस्तान, अरब, फारस
- मक्का, मदीना, श्रीलंका
- कुल 4 उदासियाँ
अन्य तथ्य
अंतिम जीवन – करतारपुर
निधन – करतारपुर
सिख धर्म के प्रथम गुरु
अंतिम जीवन – करतारपुर
निधन – करतारपुर
सिख धर्म के प्रथम गुरु
सिख गुरु परंपरा
- गुरु नानक
- गुरु अंगद
- गुरु अमरदास
- गुरु रामदास
- गुरु अर्जुनदेव (आदिग्रंथ संकलन)
- गुरु हरगोविंद
- गुरु हरराय
- गुरु हरकिशन
- गुरु तेगबहादुर
- गुरु गोविंद सिंह (1699 – खालसा पंथ)
🕉️ चैतन्य महाप्रभु
- जन्म – 1486 ई.
- जन्म स्थान – नदिया (बंगाल)
- पिता – जगन्नाथ मिश्र
- माता – शची देवी
- मूल नाम – विश्वम्भर नाथ
- बाल नाम – निमाई पंडित
गुरु एवं संप्रदाय
- प्रथम गुरु – गंगादास
- वास्तविक गुरु – केशव भारती
- स्थापना – गौड़ीय सम्प्रदाय
दर्शन
- अचिंत्य भेदाभेद
- प्रत्येक जीव कृष्ण भक्ति के योग्य
मान्यताएँ
- अनुयायी इन्हें कृष्ण/विष्णु का अवतार मानते थे
- अन्य नाम – गौरांग महाप्रभु, चैतन्य, बलदेव विद्यासागर
साहित्य
- चैतन्य चरितामृत – कृष्णदास कविराज
- स्वयं द्वारा रचित – शिक्षाष्टक (8 श्लोक)
🕉️ नरसी मेहता
- काल – 15वीं शताब्दी
- जन्म – जूनागढ़, तलजा गाँव (गुजरात)
- पिता – कृष्ण दामोदर
- पत्नी – मणिकबाई
भक्ति एवं साहित्य
- कृष्ण भक्ति
- लगभग एक लाख दोहे
- उपाधि – गुजराती साहित्य का सूरदास
प्रसिद्ध भजन
“वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर पराई जाणे रे…”
प्रमुख ग्रंथ
- श्यामलदास नो विवाह
- श्रृंगारमाला
- हारमाला
- सूरतसंग्राम
- गोविन्दगमन
🕉️ शंकरदेव
- उपाधि – असम का चैतन्य महाप्रभु
- कृष्ण भक्ति के संत
- मूर्ति पूजा के विरोधी
संप्रदाय
- एकशरण सम्प्रदाय की स्थापना
विशेषताएँ
- निर्गुण संत
- संन्यास में विश्वास नहीं
- भगवान की महिला सहयोगिनी को नहीं मानते
- मंदिरों में भागवत पुराण की पूजा
प्रमुख ग्रंथ
- भक्ति रत्नाकर
Bhakti & Sufi Movement in India :- Part 1 मध्यकालीन भारत का इतिहास , भक्ति आंदोलन : वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ
भक्ति आंदोलन : वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ
| मध्यकालीन भारत में अनेक धार्मिक विचारकों एवं समाज सुधारकों ने भारत के सामाजिक-धार्मिक जीवन में सुधार लाने के उद्देश्य से भक्ति को साधन बनाकर एक व्यापक आंदोलन का प्रारम्भ किया, जिसे ही भक्ति आंदोलन कहा जाता है। |
अपने शान्त, अहिंसक एवं आध्यात्मिक स्वरूप के कारण इसे ‘मौन क्रान्ति’ कहा गया है।
भक्ति आंदोलन की शुरुआत के प्रमुख कारण
1. भक्तिमार्ग की सरलता
प्राचीन हिन्दू धर्म में कर्मकाण्ड अत्यधिक बढ़ गया था।
यह मार्ग सामान्य जनता के लिए सरल नहीं था, इसलिए लोगों ने भक्ति मार्ग को अपनाया।
2. मुस्लिम आक्रमण
मध्यकालीन भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा
- हिन्दू मंदिरों को तोड़ा गया
- मंदिरों की सम्पत्ति लूटी गई
इससे हिन्दू समाज में धार्मिक असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई।
3. जटिल वर्ण व्यवस्था
समाज के सभी वर्णों को समान अधिकार प्राप्त नहीं थे।
इसी कारण अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयाँ फैलीं।
4. समन्वय की भावना
हिन्दू-मुस्लिम समाज के बीच आपसी समन्वय स्थापित करने की भावना जाग्रत हुई।
👉 इस मत के समर्थक थे –
- डॉ. ताराचंद
- यूसुफ हुसैन
भक्ति आंदोलन का स्वरूप
(1) निर्गुण स्वरूप (निराकार)
इस धारा में ईश्वर को निराकार माना गया।
प्रमुख संत –
- कबीरदास
- गुरु नानक
(2) सगुण स्वरूप (साकार)
इस धारा में ईश्वर को साकार माना गया।
प्रमुख संत –
- तुलसीदास
- सूरदास
- वल्लभाचार्य
- मीरा बाई
- चैतन्य महाप्रभु
मोक्ष प्राप्ति के लिए बताए गए तीन मार्ग
- ज्ञान मार्ग – उपनिषद
- कर्म मार्ग – कर्मकाण्ड (वेद)
- भक्ति मार्ग – (1) सगुण(2) निर्गुण
👉 भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख
“श्वेताश्वेतर उपनिषद” में मिलता है।
👉 भक्ति का विस्तृत उल्लेख
“श्रीमद्भगवद्गीता” में मिलता है, जहाँ इसे मोक्ष का साधन बताया गया है।
भक्ति आंदोलन के चरण
- मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को भक्ति का पुनर्जन्म / द्वितीय चरण कहा जाता है।
प्रथम चरण
- शुरुआत – 7वीं शताब्दी
- क्षेत्र – दक्षिण भारत
- संत परंपराएँ – अलवार (12 – वैष्णव) नयनार (63 – शैव)
भक्ति आंदोलन का इतिहास
- भक्ति आंदोलन का इतिहास आदिगुरु शंकराचार्य के समय से प्रारम्भ होता है।
- जबकि भक्ति आंदोलन के जनक / प्रवर्तक – रामानुजाचार्य माने जाते हैं।
वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ
वैष्णव संतों ने शंकराचार्य के अद्वैतवाद व ज्ञान मार्ग का विरोध किया और सगुण भक्ति पर अधिक बल दिया।
वैष्णव मत एवं सिद्धांत
| संत | प्रमुख संप्रदाय | मत / सिद्धांत | समय |
|---|---|---|---|
| आदिगुरु शंकराचार्य | स्मृति / स्मार्त संप्रदाय | अद्वैतवाद / केवलाद्वैत | 7–8वीं शताब्दी |
| रामानुजाचार्य | वैष्णव / श्री संप्रदाय | विशिष्टाद्वैतवाद | 12वीं शताब्दी |
| निम्बार्काचार्य | सनक संप्रदाय | द्वैताद्वैत / भेदाभेद | 12वीं शताब्दी |
| मध्वाचार्य | ब्रह्म संप्रदाय | द्वैतवाद (स्पष्ट द्वैत) | 13वीं शताब्दी |
वैष्णव संप्रदायों की सामान्य विशेषताएँ
- शंकराचार्य के अद्वैतवाद एवं ज्ञान मार्ग का विरोध
- ब्रह्म एवं जीव की पूर्ण एकता को अस्वीकार
- यह प्रचार किया कि सांसारिक जन्म के बाद जीव का ब्रह्म से एकीकरण समाप्त हो जाता है
- सगुण भक्ति पर विशेष बल
वैष्णवों के प्रयत्नों से
- भगवद्गीता की प्रतिष्ठा
- अवतारवाद की स्थापना
- विष्णु के अवतारों की पूजा
- ब्राह्मणों की सामाजिक उच्चता को स्थान
अन्य वैष्णव संत एवं परंपराएँ
सूरदास एवं मीरा बाई
- वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के समर्थक
- श्रीकृष्ण की पूजा व मूर्तिपूजा करते थे
रामानंद
- सीता-राम की पूजा का प्रचार
सखी / हरिदास संप्रदाय
संस्थापक – स्वामी हरिदास
- कृष्ण को एकमात्र पुरुष माना गया
- अन्य सभी पुरुषों को स्त्री (कृष्ण की सखी) माना गया
- पुरुष अनुयायी भी स्त्री वेश-भूषा धारण करते थे
महाराष्ट्र के भक्ति संप्रदाय
वरकरी / वारकरी संप्रदाय -
विठ्ठल (विठोबा) के अनुयायीश्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है
धरकरी संप्रदाय
राम के उपासक
संस्थापक – रामदास (शिवाजी के गुरु)
प्रमुख संत एवं उनकी जन्मस्थली
| संत | जन्म स्थल |
|---|---|
| ज्ञानेश्वर | आलंदी |
| तुकाराम | देहु |
| मध्वाचार्य | उडूपी |
| निम्बार्काचार्य | निम्बापुर, बेलारी (कर्नाटक) |
| वल्लभाचार्य | काशी |
| रामानंद | प्रयाग |
| नानक | तलवंडी |
| चैतन्य | नवद्वीप (बंगाल) |
| दादूदयाल | अहमदाबाद |
| तुलसीदास | राजापुर (बाँदा) |
| नामदेव | नरसी बमनी, सतारा |
🕉️ आदिगुरु शंकराचार्य (पूर्ण विवरण)
सामान्य परिचय
- जन्म – 788 ई.
- जन्म स्थान – केरल में पूर्णानदी के किनारे कालड़ी गाँव
- पिता – शिवगुरु
- माता – आर्याम्बा (विशिष्टादेवी)
- गुरु – गोविन्ददेवपाद
- गुरु द्वारा दी गई उपाधि – परमहंस
- उपाधि – प्रच्छन्न बौद्ध (महायान से प्रभावित)
प्रारंभिक जीवन
- जन्म के कुछ समय बाद पिता की मृत्यु
- माता ने 5 वर्ष की आयु में विद्या अध्ययन हेतु गुरु के पास भेजा
- 8 वर्ष की आयु में माता की अनुमति से संन्यास ग्रहण
जीवन की प्रमुख घटनाएँ
- केरल के राजा राजशेखर ने आमंत्रण भेजा, पर शंकर नहीं गए
- राजा स्वयं कालड़ी आए
- गुरु के आदेश पर काशी गए, शिव उपासना की
- बद्रिकाश्रम पहुँचे और बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा
शास्त्रार्थ एवं पीठ स्थापना
- नर्मदा तट पर
मण्डन मिश्रभारती (पत्नी)से शास्त्रार्थ
- दोनों पराजित हुए, शिष्य बने
- तुंगभद्रा नदी के किनारे
👉 श्रृंगेरी पीठ की स्थापना
- मण्डन मिश्र को पीठाधीश्वर बनाया
माता का अंतिम संस्कार
- श्रृंगेरी में माता की मृत्यु का समाचार मिला
- संन्यास त्यागकर कालड़ी आए
- माता का अंतिम संस्कार किया
अंतिम जीवन
- पुरी (ओडिशा) में गोवर्धन मठ की स्थापना
- 32 वर्ष की आयु में सम्पूर्ण भारत का दो बार भ्रमण
- अंतिम समय – केदारनाथ
- मृत्यु – 820 ई. (32 वर्ष की आयु में)
शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ
| आचार्य | वेद | दिशा | मठ |
|---|---|---|---|
| पद्मपाद | ऋग्वेद | पूर्व | गोवर्धन मठ |
| सुरेश्वर (मण्डन मिश्र) | यजुर्वेद | दक्षिण | श्रृंगेरी मठ |
| हस्तामलक | सामवेद | पश्चिम | शारदा मठ |
| तोटक | अथर्ववेद | उत्तर | ज्योतिर्मठ |
शंकराचार्य के प्रमुख ग्रंथ
(संस्कृत भाषा में)
- ब्रह्मसूत्र भाष्य
- उपनिषद भाष्य (12)
- गीता भाष्य
- सौन्दर्यलहरी
- विवेकचूड़ामणि
- प्रपंचसार तंत्र
- उपदेश साहसी
- मनीषा पंचम्
- अपरोक्षानुभूति
- शारीरिक भाष्य
मध्यकालीन भारत का इतिहास - भक्ति एवं सूफी आंदोलन Part -2( रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य एवं निम्बार्काचार्य ,रामानंद, कबीरदास एवं रैदास / रविदास )
मध्यकालीन भारत का इतिहास - भक्ति एवं सूफी आंदोलन Part -2( रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य एवं निम्बार्काचार्य ,रामानंद, कबीरदास एवं रैदास / रविदास )
🕉️ रामानुजाचार्य
मत / दर्शन
- विशिष्टाद्वैतवाद
- ‘विशिष्टाद्वैत’ का अर्थ है – ब्रह्म (ईश्वर) अद्वैत होते हुए भी जीव तथा जगत की शक्तियों द्वारा विशिष्ट है।
- भक्ति को दार्शनिक आधार प्रदान किया।
जन्म एवं जीवन
- जन्म – 1017 ई.
- जन्म स्थान – पेराम्बदुर (तमिलनाडु)
- सम्प्रदाय – श्री संप्रदाय
- प्रमुख केन्द्र – काँची एवं श्रीरंगम् (तमिलनाडु)
शिक्षा एवं गुरु
- प्रारम्भिक गुरु – यादवप्रकाश
- वेद एवं उपनिषदों की शिक्षा प्राप्त की
- वास्तविक गुरु – यमुनाचार्य (अलवार संत)
विचार
- कथन –“ज्ञान मोक्ष का साधन नहीं, मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्ति से बढ़कर कुछ नहीं।”
- रामानुज को ‘दक्षिण का विष्णु अवतार’ कहा जाता है।
- सगुण भक्ति धारा के समर्थक थे।
राजनीतिक विरोध
- चोल शासक कुलोत्तुंग (नयनार पक्ष) ने विरोध किया
- श्रीरंगम् छोड़कर होयसल राज्य (मैसूर) चले गए
- शासक विट्टिग (जैन) को वैष्णव बनाया
- विट्टिग ने नाम बदलकर विष्णुवर्धन रखा
प्रमुख ग्रंथ
- वेदान्तसंग्रहम्
- श्रीभाष्यम् (ब्रह्मसूत्र पर टीका)
- गीताभाष्यम्
- वेदान्त दीपम्
- वेदान्तसारम्
- शरणागतिगद्यम्
🕉️ मध्वाचार्य
(आनन्द तीर्थ)
काल
- 12–13वीं शताब्दी
मत / दर्शन
- द्वैतवाद
- आत्मा एवं परमात्मा – दो पृथक तत्त्व
- विष्णु को ही परमात्मा माना
जन्म
जन्म के दो मत –
1199–1278 ई.1238–1317 ई.
जन्म स्थान –
- उडूपी (दक्षिण कन्नड़ जिला, कर्नाटक)
- पाजक गाँव, शिवल्ली के निकट
उपाधियाँ
- पूर्णप्रज्ञ
- आनंदतीर्थ
- वायु का तीसरा अवतार
सामाजिक कार्य
- यज्ञों में दी जाने वाली पशुबलि पर रोक लगाई
सम्प्रदाय
- ब्रह्म सम्प्रदाय
प्रमुख ग्रंथ
- अणुभाष्यम्
- न्यायविवरणम्
- गीताभाष्यम्
- ऋग्भाष्यम् (ऋग्वेद के प्रथम 30 सूक्तों पर भाष्य)
दर्शन संबंधी मत
- शंकराचार्य एवं रामानुजाचार्य – दोनों के दर्शनों का खण्डन
मोक्ष न पाने वाले दो वर्ग –
- नित्य संसारी – सांसारिक बंधन में फँसे
- तमोयोग्य – जिन्हें नरक जाना निश्चित है
🕉️ निम्बार्काचार्य
काल
- 12वीं / 14वीं शताब्दी
जन्म
- जन्म स्थान – निम्बापुर (वैलारी), तमिलनाडु
- जाति – तैलंग ब्राह्मण
मत / दर्शन
- द्वैताद्वैत / भेदाभेद वाद
सम्प्रदाय
- सनक सम्प्रदाय
कार्यक्षेत्र
- वृंदावन
- मथुरा–ब्रज क्षेत्र में प्रमुख आश्रम
धार्मिक मान्यताएँ
- राधा–कृष्ण की युगल पूजा
- अवतारवाद में विश्वास
- राधा = लक्ष्मी
- कृष्ण = विष्णु का अवतार
- स्वयं को “सुदर्शन चक्र का अवतार” माना जाता है
विशेषताएँ
- दाम्पत्य भक्ति को सर्वश्रेष्ठ माना
- राजस्थान में निम्बार्क पीठ – सलेमाबाद (अजमेर) में स्थित
🔚 सारणी : चार दार्शनिक संप्रदाय (शंकर के विरुद्ध)
| आचार्य | संप्रदाय | दर्शन |
|---|---|---|
| रामानुजाचार्य | श्री संप्रदाय | विशिष्टाद्वैत |
| मध्वाचार्य | ब्रह्म संप्रदाय | द्वैत |
| वल्लभाचार्य | रुद्र संप्रदाय | शुद्धाद्वैत |
| निम्बार्काचार्य | सनक संप्रदाय | द्वैताद्वैत |
रामानंद, कबीरदास एवं रैदास / रविदास
(15वीं शताब्दी)
- हिन्दी भाषा को भक्ति का आधार बनाया।
- भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाने का श्रेय।
- कथन – “द्रविड़ भक्ति उपजी, लायो रामानंद।”
- दक्षिण भारत से उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन लाने का श्रेय।
- इसलिए इन्हें उत्तर व दक्षिण भक्ति आंदोलन का रामसेतु कहा जाता है।
गुरु एवं परंपरा
- कुछ समय तक श्री सम्प्रदाय के संत राघवानन्द के साथ रहे।
- रामानुजाचार्य के अनुयायी थे।
जन्म
- जन्म – इलाहाबाद (प्रयाग) में कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में (प्रामाणिक नहीं, कुछ विद्वान दक्षिण भारत मानते हैं)।
- पिता – पुण्यसदन
- माता – सुशीलादेवी
विचार व कार्य
- विष्णु के स्थान पर राम की पूजा का प्रचार।
- सगुण भक्ति के उपदेश हिन्दी भाषा में दिए।
- शैव एवं वैष्णव के मध्य प्रयाग में समन्वय स्थापित किया।
- जाति प्रथा व बाह्य आडम्बरों का विरोध।
- सभी जातियों के शिष्य बनाए।
शिष्य
- कुल 12 शिष्य (2 महिला) –
सुरसुरानंद, सुखानंद, नरहरिनंद, अनंतानंद, भावानंद, पद्मावती, सुरसरी।
अन्य तथ्य
- इनके प्रभाव से इस्लाम स्वीकार कर चुके लोगों ने पुनः हिन्दू धर्म ग्रहण किया।
- आनंद भाष्य में शूद्रों को वेद अध्ययन का अधिकार स्वीकार नहीं किया।
- वैरागी संघ का गठन।
- स्वतंत्र मत – रामावत / रामानंदी सम्प्रदाय।
प्रमुख ग्रंथ
- वैष्णवमताब्ज भास्कर
- रामरक्षास्तोत्रम् टीका
- सिद्धान्तपटल
- ज्ञानलीला
- योग चिंतामणि
- सतनामपंथी
🕉️ कबीरदास
जन्म एवं परिवार
- जन्म – 1440 ई. (1398 ई. भी मत)
- स्थान – काशी, वरुणा–असी संगम
- माता – अज्ञात (लोककथा अनुसार विधवा ब्राह्मण)
- पालन-पोषण – नीरू व नीमा (जुलाहा दम्पत्ति)
- नामकरण – कबीर (अरबी, अर्थ – महान)
गुरु एवं जीवन
- गुरु – रामानंद
- निर्गुण भक्ति धारा
- संन्यास में विश्वास नहीं
- निर्गुण संतों में गृहस्थ जीवन अपनाने वाले प्रथम
- पत्नी – लोई
- संतान – कमाल, कमाली
विचारधारा
- अद्वैतवाद / एकेश्वरवाद
- जाति-प्रथा के कटु आलोचक
- धन-वैभव व विलासिता का विरोध
- फक्कड़, क्रांतिकारी संत
रचनाएँ व साहित्य
- उलटबाँसी (उलटी कही उक्तियाँ)
- पद व दोहे (स्वतंत्र ग्रंथ नहीं)
- संकलन – बीजक (शिष्य भागोदास द्वारा)
अन्य तथ्य
- समकालीन शासक – बहलोल लोदी, सिकन्दर लोदी
- अबुल फ़ज़ल ने कबीर को “मुवाहिद” कहा।
- अंतिम समय – काशी से मगहर (उ.प्र.)
- पद गुरुग्रंथ साहिब में संकलित
- कबीरपंथ की स्थापना – कबीरचौरा (काशी)
- मृत्यु के बाद गद्दी – धर्मदास
- कबीर की छतरी – मगहर
काव्य शैलियाँ
- साखी – दोहा शैली
- सबद – पद शैली
- रमैनी – दार्शनिक दोहे
अनुयायी
- प्रमुख – मलूकदास (कड़ा, इलाहाबाद)
- डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी –
“युगपुरुष, युगावतार, युगप्रवर्तक, वाणी का डिक्टेटर”
🕉️ रविदास (रैदास)
जन्म एवं परिवार
- जन्म – 1398 ई., काशी
- पिता – राहु (चमार)
- माता – कर्मा
- पालक दम्पत्ति – संतोकदास व कलसादेवी
- पत्नी – लोना
गुरु
- रामानंद
- जानकारी का स्रोत – कबीर परचई
विचार
- मन की पवित्रता पर बल
- तीर्थयात्रा, व्रत, स्नान आदि का विरोध
- मानव सेवा ही सच्चा धर्म
- कर्म के माध्यम से मोक्ष
ऐतिहासिक संदर्भ
- प्रवचन – सिकन्दर लोदी
- समकालीन – बाबर, हुमायूँ, शेरशाह सूरी
- कबीर ने रैदास को “संतों का संत” कहा
प्रभाव
- रैदास सम्प्रदाय की स्थापना – काशी
- चित्तौड़ की रानी झाली व मीरा बाई के आध्यात्मिक गुरु
मध्यकालीन भारत का इतिहास - मुगल साम्राज्य का इतिहास (1526–1707 ई.) | Mughal Empire Complete History in Hindi
मुगल साम्राज्य का इतिहास (1526–1707 ई.) | Mughal Empire Complete History in Hindi
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मुगल साम्राज्य का इतिहास (1526–1707 ई.) | Mughal Empire Complete History in Hindi |
मुगल साम्राज्य भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय है जिसने राजनीति, प्रशासन, स्थापत्य, संस्कृति और धार्मिक नीति – सभी क्षेत्रों को गहराई से प्रभावित किया। यह साम्राज्य 1526 ई. से 1707 ई. तक लगभग 200 वर्षों तक भारत में सत्तारूढ़ रहा।
यह लेख UPSC, RPSC, SSC, State PCS, Police, NET/JRF जैसी परीक्षाओं के लिए पूर्ण, प्रमाणिक और परीक्षा-उपयोगी है।
👑 बाबर (1526–1530 ई.)
बाबर का जन्म 1483 ई. में हुआ। 1494 ई. में वह ट्रांस-ऑक्सियाना की छोटी-सी रियासत फरगना का उत्तराधिकारी बना।
वह पिता की ओर से तैमूर तथा माता की ओर से चंगेज़ खाँ का वंशज था। उसके पिता उमर शेख मिर्जा चगताई तुर्क थे।
भारत पर आक्रमण
1519 से 1524 ई. तक बाबर ने चार बार भारत पर आक्रमण किया।
1518–19 ई. में भेरा के किले पर आक्रमण → भारत में प्रथम बार तोपखाने का प्रयोग
बाबर ने मध्य एशिया की अनिश्चित स्थिति व भारत की अपार धन-संपदा के कारण भारत का रुख किया।
प्रमुख युद्ध
पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल 1526)
बाबर बनाम इब्राहिम लोदी
परिणाम → दिल्ली सल्तनत का अंत, मुगल वंश की स्थापना
युद्ध पद्धति → तुलुगामा प्रणाली एवं उस्मानी (रूमी) तोप व्यवस्था
खानवा युद्ध (17 मार्च 1527)
बाबर बनाम राणा सांगा
बाबर ने “जिहाद” का नारा दिया
विजय के बाद बाबर ने “गाज़ी” की उपाधि धारण की
चंदेरी युद्ध (1528) – मेदिनीराय पर विजय
घाघरा युद्ध (5 मई 1529) – महमूद लोदी पर विजय
➡️ यह स्थल और जल पर लड़ा गया प्रथम मध्यकालीन युद्ध था।
अन्य तथ्य
उदारता के कारण बाबर को “कलंदर” कहा गया
आत्मकथा → तुजुक-ए-बाबरी (बाबरनामा)
फारसी अनुवाद → रहीम ख़ान-ए-खाना
मृत्यु → 1530 ई., आगरा
मकबरा → काबुल
👑 हुमायूँ (1530–1556 ई.)
हुमायूँ 1530 ई. में 23 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा। उसके सामने प्रशासनिक, आर्थिक तथा अफगान संकट जैसी अनेक समस्याएँ थीं।
प्रमुख घटनाएँ
भाई कामरान → काबुल, कंधार, लाहौर, मुल्तान
दीनपनाह नगर (दिल्ली) की स्थापना
मालवा व गुजरात विजय
मांडू किले का विजेता बनने वाला 41वाँ शासक
शेरखाँ से संघर्ष
चौसा (26 जून 1539) → पराजय
कन्नौज/बिलग्राम (17 मई 1540) → निर्णायक हार
भिश्ती निज़ाम द्वारा गंगा में प्राण रक्षा
निर्वासन और वापसी
1542 → अमरकोट
ईरान में शरण
1545 → काबुल व कंधार पुनः प्राप्त
1555 → दिल्ली पर पुनः अधिकार
मृत्यु
दीनपनाह पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण
🐅 सूर वंश (1540–1555 ई.)
👑 शेरशाह सूरी (1540–1545 ई.)
शेरशाह का वास्तविक नाम फरीद था। चौसा और कन्नौज में हुमायूँ को पराजित कर उसने द्वितीय अफगान साम्राज्य की स्थापना की।
प्रशासनिक सुधार
इक्ता → सरकार → परगना → गाँव
66 सरकारें (अब्बास खाँ सरवानी)
न्यायप्रिय शासक – बुधवार को स्वयं न्याय
भू-राजस्व व्यवस्था
रैय्यतवाड़ी प्रणाली
लगान → सामान्यतः 1/3 (मुल्तान 1/4)
मापन → सिकन्दरी गज, सन की रस्सी
प्रणालियाँ → बटाई, कनकूत, नकदी (जब्ती)
मुद्रा व्यवस्था
रुपया (चाँदी) – प्रथम बार
अशरफ (सोना), दाम (ताँबा)
23 टकसालें
जनहित व निर्माण
ग्रांड ट्रंक रोड (G.T. Road)
1700 सराय, डाक व्यवस्था
सासाराम का मकबरा (अष्टकोणीय, झील के मध्य)
पुराना किला, क़िला-ए-कुहना मस्जिद
मृत्यु
कालिंजर अभियान के दौरान बारूद विस्फोट से
👑 अकबर (1556–1605 ई.)
जन्म → 1542, अमरकोट
राज्यारोहण → 1556, कलानौर
संरक्षक → बैरम खाँ
प्रमुख युद्ध
पानीपत द्वितीय (1556) – हेमू पर विजय
हल्दीघाटी (1576) – महाराणा प्रताप
प्रशासन व धार्मिक नीति
मनसबदारी व्यवस्था
दहसाला प्रणाली – टोडरमल
सुलह-ए-कुल
दीन-ए-इलाही (1582) – प्रधान: अबुल फ़ज़ल
सांस्कृतिक योगदान
मकतबखाना (1574)
महाभारत → रज्मनामा
पंचतंत्र → अनवार-ए-सुहैली
👑 जहाँगीर (1605–1627 ई.)
आत्मकथा → तुजुक-ए-जहाँगीरी
न्याय की जंजीर
नूरजहाँ का प्रभाव
मकबरा → शाहदरा (लाहौर)
👑 शाहजहाँ (1628–1658 ई.)
स्थापत्य का स्वर्ण युग
ताजमहल, तख्त-ए-ताउस
👑 औरंगजेब (1658–1707 ई.)
उपाधि → आलमगीर
जजिया (1679)
मराठा संघर्ष
मकबरा → खुल्दाबाद (दौलताबाद)
मुगल साम्राज्य ने भारत को प्रशासनिक स्थिरता, स्थापत्य वैभव, सांस्कृतिक समन्वय और राजनीतिक एकीकरण प्रदान किया। इसके उत्थान-पतन से भारत के मध्यकालीन इतिहास की संपूर्ण तस्वीर स्पष्ट होती है।
❓ FAQs (Exam Oriented)
Q1. भारत में तोपखाने का प्रथम प्रयोग किसने किया?
➡️ बाबर
Q2. रुपया सर्वप्रथम किसने चलाया?
➡️ शेरशाह सूरी
Q3. दीन-ए-इलाही किसने चलाया?
➡️ अकबर
Q4. न्याय की जंजीर किस शासक ने लगवाई?
➡️ जहाँगीर
Q5. ताजमहल का निर्माता कौन था?
➡️ शाहजहाँ
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मुगल साम्राज्य का इतिहास (1526–1707) | Mughal Empire Complete Notes in Hindi
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मुगल साम्राज्य का संपूर्ण इतिहास – बाबर से औरंगजेब तक | UPSC, RPSC, SSC के लिए परीक्षा-उपयोगी हिंदी नोट्स।
Focus Keywords:
मुगल साम्राज्य, Mughal Empire in Hindi, Babur Akbar Aurangzeb History, Medieval India History Hindi
मध्यकालीन भारत का इतिहास विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) – परीक्षा उपयोगी संपूर्ण अध्ययन
विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) – परीक्षा उपयोगी संपूर्ण अध्ययन
विजयनगर एक शहर का नाम भी था और एक शक्तिशाली साम्राज्य का भी, जिसने मध्यकालीन दक्षिण भारत में लगभग तीन शताब्दियों तक राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक नेतृत्व प्रदान किया। यह साम्राज्य हिंदू पुनर्जागरण, सुदृढ़ प्रशासन, उत्कृष्ट स्थापत्य कला और समृद्ध साहित्य के लिए प्रसिद्ध रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं (RAS, UPSC, REET, SI, NET आदि) की दृष्टि से विजयनगर अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
विजयनगर के अन्य नाम (विदेशी यात्रियों व समकालीन स्रोतों में)
- बिसनग – नूनिज एवं पेस
- बिजेनगोलिया – निकोलो कोंटी
- बिसनगर – अब्दुर्रज्जाक
- कर्नाटक साम्राज्य – समकालीन भारतीय लोग
हम्पी (हस्तिनावती / पम्पाक्षेत्र)
- विजयनगर की स्थापना हस्तिनावती (इस्तिनावती) के ध्वंसावशेषों पर हुई
- हम्पी नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पा देवी के नाम पर पड़ा
- वर्तमान में विजयनगर का नाम हम्पी है
- स्थिति – तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर
पुरातात्त्विक खोज एवं संरक्षण
- 1800 ई. – अभियंता एवं पुराविद कालिन मैकेन्जी ने भग्नावशेष खोजे
- अलेक्जेंडर ग्रानिलो – अवशेषों के प्रथम विस्तृत चित्र
- 1876 ई. – जे. एफ. फ्लीट द्वारा मंदिरों के अभिलेखों का प्रलेखन
- 1976 ई. – राष्ट्रीय स्मारक घोषित
- 1986 ई. – यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल
स्थापना एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि
- संस्थापक – हरिहर एवं बुक्का
- स्थापना वर्ष – 1336 ई.
- विशेष – प्रशासनिक मॉडल सहकारिता (Segmentary State Model) पर आधारित
- इतिहासकार बर्टन स्टाइन ने इसे उपनिवेश-पूर्व दक्षिण भारत की साझा शासन-प्रणाली बताया
रायचूर दोआब (Raichur Doab)
- कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच का क्षेत्र
- उत्तर में – बहमनी राज्य | दक्षिण में – विजयनगर
- हीरे, लोहे की खानें व उपजाऊ भूमि
- 1356 ई. – अलाउद्दीन बहमनशाह द्वारा संघर्ष की शुरुआत
विजयनगर से निर्यात की प्रमुख वस्तु
- काली मिर्च (Black Pepper) – सबसे महत्वपूर्ण निर्यात
विजयनगर पर शासन करने वाले वंश
| वंश | अवधि | संस्थापक | अंतिम शासक |
|---|---|---|---|
| संगम | 1336–1485 | हरिहर–बुक्का | विरुपाक्ष द्वितीय |
| सालुव | 1486–1505 | सालुव नरसिंह | इम्माडि नरसिंह |
| तुलुव | 1505–1570 | वीर नरसिंह | सदाशिवराय |
| अराविडू | 1570–1652 | तिरुमल | श्रीरंग तृतीय |
- संगम वंश – महानतम: देवराय द्वितीय
- तुलुव वंश – महानतम: कृष्णदेवराय
- अराविडू वंश – महानतम: वेंकट प्रथम
विजयनगर की राजधानियाँ (क्रमानुसार)
- अनेगोण्डी / कांपिली (1336–1342)
- विजय नगर / विद्यानगर (1342–1570)
- बेनुगोण्डा / पेनुगोण्डा (1570–1614)
- चन्द्रगिरि (1614 ई.)
संगम वंश का विस्तृत अध्ययन
हरिहर प्रथम (1336–1356)
- 1336 ई. – हम्पी की नींव
- 1342 ई. – विजयनगर राजधानी घोषित
- होयसलों का विलय
- मदुरा विजय – कुमार कंपन के नेतृत्व में
- गंगा देवी – मदुरा विजयम् (ग्रंथ)
बुक्का प्रथम (1356–1377)
- साम्राज्यवादी नीति
- 1370–71 – मदुरै का विलय
- 1374 – चीन में दूतमंडल
- उपाधि – वेदमार्ग प्रतिष्ठापक
विजयनगर–बहमनी संघर्ष (1367 से)
कारण
- रायचूर दोआब
- खनिज संपदा
- कृष्णा–गोदावरी डेल्टा
संधि शर्तें
- रायचूर दोआब – विजयनगर के अधीन
- कृष्णा नदी – सीमा रेखा
हरिहर द्वितीय (1377–1404)
- प्रथम शासक जिसने महाराजाधिराज की उपाधि ली
- बेलगाँव व गोवा पर अधिकार
- श्रीलंका से राजस्व वसूली
- विद्वानों का संरक्षण – राज व्यास कहलाया
देवराय प्रथम (1406–1422)
- बहमनी शासक फिरोजशाह से पराजय
- “सुनार की बेटी का युद्ध”
- तुंगभद्रा–हरिद्रा पर बाँध
- यात्री – निकोलो कोंटी (1420)
देवराय द्वितीय (1422–1446)
- संगम वंश का महानतम शासक
- दरबार में कुरान रखता था
- फारसी यात्री – अब्दुर्रज्जाक
- दहेज प्रथा अवैधानिक घोषित
- विद्वान – कन्नड़ कवि चामरस
सालुव वंश (1486–1505)
- सालुव नरसिंह – संगम वंश का अंत
- वास्तविक शक्ति – नरसा नायक
- रायचूर दोआब पुनः विजित
तुलुव वंश (1505–1570)
वीर नरसिंह (1505–1509)
- द्वितीय बलाप्रहार
- पुर्तगाली गवर्नर फ्रांसिस्को-डी-अल्मेडा से समझौता
कृष्णदेवराय (1509–1529) – स्वर्ण युग
- वैष्णव धर्म का अनुयायी
- यात्री – डोमिंगो पायस, नूनिज, बारबोसा
- 1520 – रायचूर युद्ध में इस्माइल आदिलशाह पर विजय
- पुर्तगाली सहयोग – क्रिस्टोवाओ डी फिगेरेडो
- ग्रंथ – आमुक्तमाल्यद (तेलुगु)
कला एवं स्थापत्य (Art & Architecture)
- केन्द्र – हम्पी
- आधार – द्रविड़ शैली, पर विशिष्ट विजयनगर विशेषताएँ
- कल्याण मंडप, सहस्र स्तंभ मंडप
- स्तंभों पर दरियाई घोड़े (याली)
- अम्मन मंदिरों का प्रसार
- अंतिम चरण – मदुरा शैली
प्रमुख स्थापत्य
- विठ्ठलस्वामी मंदिर
- हजारराम मंदिर
- लोटस महल
- हस्तिशाला
- लीपाक्षी मंदिर (एकाश्मक नंदी)
- सिंहासन मंच
मूर्तिकला
- कांस्य मूर्तियाँ
- कृष्णदेवराय व उनकी पत्नियाँ
- वेंकट प्रथम की प्रतिमा
साहित्यिक प्रगति
(1) संस्कृत साहित्य
- माध्वाचार्य – सर्वदर्शन संग्रह
- सायण – सुधानिधि
- विद्यारण्य – राजकाल निर्णय
- व्यासराय – न्यायामृत
(2) तेलुगु साहित्य
- स्वर्णकाल – कृष्णदेवराय का शासन
- अष्टदिग्गज – अल्लसानी पेड्डना, तेनालि रामकृष्ण आदि
प्रमुख महाकाव्य –
- आमुक्तमाल्यद
- मनुचरितम्
- वसुचरित
(3) कन्नड़ साहित्य
- चामरस – प्रभूलिंग लीले
- केतन – दशकुमारचरित का अनुवाद
Exam Point of View
विजयनगर साम्राज्य राजनीतिक स्थिरता, धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक समृद्धि, स्थापत्य वैभव और साहित्यिक उत्कर्ष का प्रतीक था। विशेष रूप से कृष्णदेवराय का काल विजयनगर इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है।




