विजयनगर साम्राज्य (Vijayanagar Empire) – परीक्षा उपयोगी संपूर्ण अध्ययन
विजयनगर एक शहर का नाम भी था और एक शक्तिशाली साम्राज्य का भी, जिसने मध्यकालीन दक्षिण भारत में लगभग तीन शताब्दियों तक राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक नेतृत्व प्रदान किया। यह साम्राज्य हिंदू पुनर्जागरण, सुदृढ़ प्रशासन, उत्कृष्ट स्थापत्य कला और समृद्ध साहित्य के लिए प्रसिद्ध रहा। प्रतियोगी परीक्षाओं (RAS, UPSC, REET, SI, NET आदि) की दृष्टि से विजयनगर अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है।
विजयनगर के अन्य नाम (विदेशी यात्रियों व समकालीन स्रोतों में)
- बिसनग – नूनिज एवं पेस
- बिजेनगोलिया – निकोलो कोंटी
- बिसनगर – अब्दुर्रज्जाक
- कर्नाटक साम्राज्य – समकालीन भारतीय लोग
हम्पी (हस्तिनावती / पम्पाक्षेत्र)
- विजयनगर की स्थापना हस्तिनावती (इस्तिनावती) के ध्वंसावशेषों पर हुई
- हम्पी नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पा देवी के नाम पर पड़ा
- वर्तमान में विजयनगर का नाम हम्पी है
- स्थिति – तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी तट पर
पुरातात्त्विक खोज एवं संरक्षण
- 1800 ई. – अभियंता एवं पुराविद कालिन मैकेन्जी ने भग्नावशेष खोजे
- अलेक्जेंडर ग्रानिलो – अवशेषों के प्रथम विस्तृत चित्र
- 1876 ई. – जे. एफ. फ्लीट द्वारा मंदिरों के अभिलेखों का प्रलेखन
- 1976 ई. – राष्ट्रीय स्मारक घोषित
- 1986 ई. – यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल
स्थापना एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि
- संस्थापक – हरिहर एवं बुक्का
- स्थापना वर्ष – 1336 ई.
- विशेष – प्रशासनिक मॉडल सहकारिता (Segmentary State Model) पर आधारित
- इतिहासकार बर्टन स्टाइन ने इसे उपनिवेश-पूर्व दक्षिण भारत की साझा शासन-प्रणाली बताया
रायचूर दोआब (Raichur Doab)
- कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच का क्षेत्र
- उत्तर में – बहमनी राज्य | दक्षिण में – विजयनगर
- हीरे, लोहे की खानें व उपजाऊ भूमि
- 1356 ई. – अलाउद्दीन बहमनशाह द्वारा संघर्ष की शुरुआत
विजयनगर से निर्यात की प्रमुख वस्तु
- काली मिर्च (Black Pepper) – सबसे महत्वपूर्ण निर्यात
विजयनगर पर शासन करने वाले वंश
| वंश | अवधि | संस्थापक | अंतिम शासक |
|---|---|---|---|
| संगम | 1336–1485 | हरिहर–बुक्का | विरुपाक्ष द्वितीय |
| सालुव | 1486–1505 | सालुव नरसिंह | इम्माडि नरसिंह |
| तुलुव | 1505–1570 | वीर नरसिंह | सदाशिवराय |
| अराविडू | 1570–1652 | तिरुमल | श्रीरंग तृतीय |
- संगम वंश – महानतम: देवराय द्वितीय
- तुलुव वंश – महानतम: कृष्णदेवराय
- अराविडू वंश – महानतम: वेंकट प्रथम
विजयनगर की राजधानियाँ (क्रमानुसार)
- अनेगोण्डी / कांपिली (1336–1342)
- विजय नगर / विद्यानगर (1342–1570)
- बेनुगोण्डा / पेनुगोण्डा (1570–1614)
- चन्द्रगिरि (1614 ई.)
संगम वंश का विस्तृत अध्ययन
हरिहर प्रथम (1336–1356)
- 1336 ई. – हम्पी की नींव
- 1342 ई. – विजयनगर राजधानी घोषित
- होयसलों का विलय
- मदुरा विजय – कुमार कंपन के नेतृत्व में
- गंगा देवी – मदुरा विजयम् (ग्रंथ)
बुक्का प्रथम (1356–1377)
- साम्राज्यवादी नीति
- 1370–71 – मदुरै का विलय
- 1374 – चीन में दूतमंडल
- उपाधि – वेदमार्ग प्रतिष्ठापक
विजयनगर–बहमनी संघर्ष (1367 से)
कारण
- रायचूर दोआब
- खनिज संपदा
- कृष्णा–गोदावरी डेल्टा
संधि शर्तें
- रायचूर दोआब – विजयनगर के अधीन
- कृष्णा नदी – सीमा रेखा
हरिहर द्वितीय (1377–1404)
- प्रथम शासक जिसने महाराजाधिराज की उपाधि ली
- बेलगाँव व गोवा पर अधिकार
- श्रीलंका से राजस्व वसूली
- विद्वानों का संरक्षण – राज व्यास कहलाया
देवराय प्रथम (1406–1422)
- बहमनी शासक फिरोजशाह से पराजय
- “सुनार की बेटी का युद्ध”
- तुंगभद्रा–हरिद्रा पर बाँध
- यात्री – निकोलो कोंटी (1420)
देवराय द्वितीय (1422–1446)
- संगम वंश का महानतम शासक
- दरबार में कुरान रखता था
- फारसी यात्री – अब्दुर्रज्जाक
- दहेज प्रथा अवैधानिक घोषित
- विद्वान – कन्नड़ कवि चामरस
सालुव वंश (1486–1505)
- सालुव नरसिंह – संगम वंश का अंत
- वास्तविक शक्ति – नरसा नायक
- रायचूर दोआब पुनः विजित
तुलुव वंश (1505–1570)
वीर नरसिंह (1505–1509)
- द्वितीय बलाप्रहार
- पुर्तगाली गवर्नर फ्रांसिस्को-डी-अल्मेडा से समझौता
कृष्णदेवराय (1509–1529) – स्वर्ण युग
- वैष्णव धर्म का अनुयायी
- यात्री – डोमिंगो पायस, नूनिज, बारबोसा
- 1520 – रायचूर युद्ध में इस्माइल आदिलशाह पर विजय
- पुर्तगाली सहयोग – क्रिस्टोवाओ डी फिगेरेडो
- ग्रंथ – आमुक्तमाल्यद (तेलुगु)
कला एवं स्थापत्य (Art & Architecture)
- केन्द्र – हम्पी
- आधार – द्रविड़ शैली, पर विशिष्ट विजयनगर विशेषताएँ
- कल्याण मंडप, सहस्र स्तंभ मंडप
- स्तंभों पर दरियाई घोड़े (याली)
- अम्मन मंदिरों का प्रसार
- अंतिम चरण – मदुरा शैली
प्रमुख स्थापत्य
- विठ्ठलस्वामी मंदिर
- हजारराम मंदिर
- लोटस महल
- हस्तिशाला
- लीपाक्षी मंदिर (एकाश्मक नंदी)
- सिंहासन मंच
मूर्तिकला
- कांस्य मूर्तियाँ
- कृष्णदेवराय व उनकी पत्नियाँ
- वेंकट प्रथम की प्रतिमा
साहित्यिक प्रगति
(1) संस्कृत साहित्य
- माध्वाचार्य – सर्वदर्शन संग्रह
- सायण – सुधानिधि
- विद्यारण्य – राजकाल निर्णय
- व्यासराय – न्यायामृत
(2) तेलुगु साहित्य
- स्वर्णकाल – कृष्णदेवराय का शासन
- अष्टदिग्गज – अल्लसानी पेड्डना, तेनालि रामकृष्ण आदि
प्रमुख महाकाव्य –
- आमुक्तमाल्यद
- मनुचरितम्
- वसुचरित
(3) कन्नड़ साहित्य
- चामरस – प्रभूलिंग लीले
- केतन – दशकुमारचरित का अनुवाद
Exam Point of View
विजयनगर साम्राज्य राजनीतिक स्थिरता, धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक समृद्धि, स्थापत्य वैभव और साहित्यिक उत्कर्ष का प्रतीक था। विशेष रूप से कृष्णदेवराय का काल विजयनगर इतिहास का स्वर्ण युग माना जाता है।

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