Bhakti & Sufi Movement in India :- Part 1 मध्यकालीन भारत का इतिहास , भक्ति आंदोलन : वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ

 भक्ति आंदोलन : वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ


भक्ति आंदोलन : वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ
Bhakti & Sufi Movement in India

🕉️ भक्ति आंदोलन

मध्यकालीन भारत में अनेक धार्मिक विचारकों एवं समाज सुधारकों ने भारत के सामाजिक-धार्मिक जीवन में सुधार लाने के उद्देश्य से भक्ति को साधन बनाकर एक व्यापक आंदोलन का प्रारम्भ किया, जिसे ही भक्ति आंदोलन कहा जाता है।
अपने शान्त, अहिंसक एवं आध्यात्मिक स्वरूप के कारण इसे ‘मौन क्रान्ति’ कहा गया है।


भक्ति आंदोलन की शुरुआत के प्रमुख कारण

1. भक्तिमार्ग की सरलता

प्राचीन हिन्दू धर्म में कर्मकाण्ड अत्यधिक बढ़ गया था।
यह मार्ग सामान्य जनता के लिए सरल नहीं था, इसलिए लोगों ने भक्ति मार्ग को अपनाया।

2. मुस्लिम आक्रमण

मध्यकालीन भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा

  • हिन्दू मंदिरों को तोड़ा गया
  • मंदिरों की सम्पत्ति लूटी गई

इससे हिन्दू समाज में धार्मिक असुरक्षा की भावना उत्पन्न हुई।

3. जटिल वर्ण व्यवस्था

समाज के सभी वर्णों को समान अधिकार प्राप्त नहीं थे।
इसी कारण अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयाँ फैलीं।

4. समन्वय की भावना

हिन्दू-मुस्लिम समाज के बीच आपसी समन्वय स्थापित करने की भावना जाग्रत हुई।
👉 इस मत के समर्थक थे –

  • डॉ. ताराचंद
  • यूसुफ हुसैन


भक्ति आंदोलन का स्वरूप

(1) निर्गुण स्वरूप (निराकार)

इस धारा में ईश्वर को निराकार माना गया।

प्रमुख संत

  • कबीरदास
  • गुरु नानक


(2) सगुण स्वरूप (साकार)

इस धारा में ईश्वर को साकार माना गया।

प्रमुख संत

  • तुलसीदास
  • सूरदास
  • वल्लभाचार्य
  • मीरा बाई
  • चैतन्य महाप्रभु


मोक्ष प्राप्ति के लिए बताए गए तीन मार्ग

  1. ज्ञान मार्ग – उपनिषद
  2. कर्म मार्ग – कर्मकाण्ड (वेद)
  3. भक्ति मार्ग –  (1) सगुण(2) निर्गुण

👉 भक्ति का सर्वप्रथम उल्लेख
“श्वेताश्वेतर उपनिषद” में मिलता है।

👉 भक्ति का विस्तृत उल्लेख
“श्रीमद्भगवद्गीता” में मिलता है, जहाँ इसे मोक्ष का साधन बताया गया है।


भक्ति आंदोलन के चरण

  • मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को भक्ति का पुनर्जन्म / द्वितीय चरण कहा जाता है।

प्रथम चरण

  • शुरुआत – 7वीं शताब्दी
  • क्षेत्र – दक्षिण भारत
  • संत परंपराएँ –   अलवार (12 – वैष्णव)   नयनार (63 – शैव)


भक्ति आंदोलन का इतिहास

  • भक्ति आंदोलन का इतिहास आदिगुरु शंकराचार्य के समय से प्रारम्भ होता है।
  • जबकि भक्ति आंदोलन के जनक / प्रवर्तक – रामानुजाचार्य माने जाते हैं।

वैष्णव संप्रदाय, शंकराचार्य का जीवन, दर्शन, मठ व ग्रंथ


वैष्णव संतों ने शंकराचार्य के अद्वैतवाद व ज्ञान मार्ग का विरोध किया और सगुण भक्ति पर अधिक बल दिया।

वैष्णव मत एवं सिद्धांत

संतप्रमुख संप्रदायमत / सिद्धांतसमय
आदिगुरु शंकराचार्यस्मृति / स्मार्त संप्रदायअद्वैतवाद / केवलाद्वैत7–8वीं शताब्दी
रामानुजाचार्यवैष्णव / श्री संप्रदायविशिष्टाद्वैतवाद12वीं शताब्दी
निम्बार्काचार्यसनक संप्रदायद्वैताद्वैत / भेदाभेद12वीं शताब्दी
मध्वाचार्यब्रह्म संप्रदायद्वैतवाद (स्पष्ट द्वैत)13वीं शताब्दी

वैष्णव संप्रदायों की सामान्य विशेषताएँ

  • शंकराचार्य के अद्वैतवाद एवं ज्ञान मार्ग का विरोध
  • ब्रह्म एवं जीव की पूर्ण एकता को अस्वीकार
  • यह प्रचार किया कि सांसारिक जन्म के बाद जीव का ब्रह्म से एकीकरण समाप्त हो जाता है
  • सगुण भक्ति पर विशेष बल

वैष्णवों के प्रयत्नों से

  • भगवद्गीता की प्रतिष्ठा
  • अवतारवाद की स्थापना
  • विष्णु के अवतारों की पूजा
  • ब्राह्मणों की सामाजिक उच्चता को स्थान


अन्य वैष्णव संत एवं परंपराएँ

सूरदास एवं मीरा बाई

  • वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग के समर्थक
  • श्रीकृष्ण की पूजा व मूर्तिपूजा करते थे

रामानंद

  • सीता-राम की पूजा का प्रचार

सखी / हरिदास संप्रदाय

संस्थापक – स्वामी हरिदास

  • कृष्ण को एकमात्र पुरुष माना गया
  • अन्य सभी पुरुषों को स्त्री (कृष्ण की सखी) माना गया
  • पुरुष अनुयायी भी स्त्री वेश-भूषा धारण करते थे


महाराष्ट्र के भक्ति संप्रदाय

  • वरकरी / वारकरी संप्रदाय -  

विठ्ठल (विठोबा) के अनुयायी  
 श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है
  • धरकरी संप्रदाय

राम के उपासक

संस्थापक – रामदास (शिवाजी के गुरु)

प्रमुख संत एवं उनकी जन्मस्थली

संतजन्म स्थल
ज्ञानेश्वरआलंदी
तुकारामदेहु
मध्वाचार्यउडूपी
निम्बार्काचार्यनिम्बापुर, बेलारी (कर्नाटक)
वल्लभाचार्यकाशी
रामानंदप्रयाग
नानकतलवंडी
चैतन्यनवद्वीप (बंगाल)
दादूदयालअहमदाबाद
तुलसीदासराजापुर (बाँदा)
नामदेवनरसी बमनी, सतारा

🕉️ आदिगुरु शंकराचार्य (पूर्ण विवरण)

सामान्य परिचय

  • जन्म – 788 ई.
  • जन्म स्थान – केरल में पूर्णानदी के किनारे कालड़ी गाँव
  • पिता – शिवगुरु
  • माता – आर्याम्बा (विशिष्टादेवी)
  • गुरु – गोविन्ददेवपाद
  • गुरु द्वारा दी गई उपाधि – परमहंस
  • उपाधि – प्रच्छन्न बौद्ध (महायान से प्रभावित)


प्रारंभिक जीवन

  • जन्म के कुछ समय बाद पिता की मृत्यु
  • माता ने 5 वर्ष की आयु में विद्या अध्ययन हेतु गुरु के पास भेजा
  • 8 वर्ष की आयु में माता की अनुमति से संन्यास ग्रहण


जीवन की प्रमुख घटनाएँ

  • केरल के राजा राजशेखर ने आमंत्रण भेजा, पर शंकर नहीं गए
  • राजा स्वयं कालड़ी आए
  • गुरु के आदेश पर काशी गए, शिव उपासना की
  • बद्रिकाश्रम पहुँचे और बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा


शास्त्रार्थ एवं पीठ स्थापना

  • नर्मदा तट पर

मण्डन मिश्र
भारती (पत्नी)
से शास्त्रार्थ

  • दोनों पराजित हुए, शिष्य बने
  • तुंगभद्रा नदी के किनारे

👉 श्रृंगेरी पीठ की स्थापना
  • मण्डन मिश्र को पीठाधीश्वर बनाया

माता का अंतिम संस्कार

  • श्रृंगेरी में माता की मृत्यु का समाचार मिला
  • संन्यास त्यागकर कालड़ी आए
  • माता का अंतिम संस्कार किया


अंतिम जीवन

  • पुरी (ओडिशा) में गोवर्धन मठ की स्थापना
  • 32 वर्ष की आयु में सम्पूर्ण भारत का दो बार भ्रमण
  • अंतिम समय – केदारनाथ
  • मृत्यु – 820 ई. (32 वर्ष की आयु में)


शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ

आचार्यवेददिशामठ
पद्मपादऋग्वेदपूर्वगोवर्धन मठ
सुरेश्वर (मण्डन मिश्र)यजुर्वेददक्षिणश्रृंगेरी मठ
हस्तामलकसामवेदपश्चिमशारदा मठ
तोटकअथर्ववेदउत्तरज्योतिर्मठ

शंकराचार्य के प्रमुख ग्रंथ

(संस्कृत भाषा में)

  1. ब्रह्मसूत्र भाष्य
  2. उपनिषद भाष्य (12)
  3. गीता भाष्य
  4. सौन्दर्यलहरी
  5. विवेकचूड़ामणि
  6. प्रपंचसार तंत्र
  7. उपदेश साहसी
  8. मनीषा पंचम्
  9. अपरोक्षानुभूति
  10. शारीरिक भाष्य

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