आधुनिक भारत का इतिहास (History of Modern India) - ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं बंगाल

आधुनिक भारत का इतिहास (History of Modern India) - ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं बंगाल




 भारत में यूरोपियों के आगमन का क्रम

कंपनी (Company)आगमन (Arrival)पहली फैक्ट्री (First Factory)स्थापना (Establishment)
पुर्तगाली (Portuguese)1498कोचीन (Cochin)1503 ई.
डच (Dutch)1596मछलीपट्टनम (Masulipatnam)1605 ई.
अंग्रेज (English)1698*मछलीपट्टनम (Masulipatnam)1611 ई.
डेनमार्क (Danish)1616तंजौर (Tanjore)1620 ई.
फ्रांसीसी (French)1664सूरत (Surat)1668 ई.

[!NOTE]
ध्यान दें: तालिका में अंग्रेजों के आगमन का वर्ष 1698 लिखा है, लेकिन ऐतिहासिक रूप से कैप्टन हॉकिन्स 1608 में सूरत पहुँचे थे। 1698 की तारीख संभवतः किसी विशिष्ट क्षेत्रीय घटना या कलकत्ता की स्थापना से संबंधित हो सकती है।

भारत में पुर्तगालियों के आगमन 


मुख्य बिंदु:
  • वास्को-डि-गामा का आगमन (1498 ई.): प्रथम यूरोपीय यात्री वास्को-डि-गामा, एक गुजराती पथ प्रदर्शक अब्दुल मनीक की मदद से 90 दिन की यात्रा के बाद कालीकट के तट पर पहुँचा।
  • व्यापारिक केंद्र: पुर्तगालियों ने कालीकट, गोवा, दमन, दीव और हुगली जैसे बंदरगाहों पर अपनी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित कीं।
  • प्रथम दुर्ग (1503 ई.): मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार जमाने के लिए उन्होंने कोचीन में अपना पहला दुर्ग बनाया।
  • प्रमुख गवर्नर:
    • फ्रांसिस्को द अल्मीडा (1505 ई.): यह प्रथम पुर्तगाली वायसराय था, जिसने "नीले पानी की नीति" (Blue Water Policy) अपनाई।
    • अल्फांसो द अल्बुकर्क (1509 ई.): यह दूसरा वायसराय था। उसने कोचीन को अपना मुख्यालय बनाया और गोवा में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।
    • नीनो-डी-कुन्हा: इसने 1530 ई. में अपना कार्यालय कोचीन से गोवा स्थानांतरित किया और इसे औपचारिक राजधानी बनाया।
भारत पर पुर्तगाली प्रभाव
  • स्थापत्य कला: भारत में गोथिक स्थापत्य कला की शुरुआत पुर्तगालियों ने की थी। उन्होंने गोवा, दमन और दीव पर 1961 ई. तक शासन किया।
  • व्यापार: भारत और जापान के बीच व्यापार शुरू करने का श्रेय पुर्तगालियों को ही जाता है।
  • प्रिंटिंग प्रेस: भारत की पहली प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना 1556 ई. में गोवा में पुर्तगालियों द्वारा की गई थी।
  • प्रथम पुस्तक: 1563 ई. में भारतीय जड़ी-बूटियों पर आधारित पहली पुस्तक 'द इंडियन मेडिसनल प्लांट्स' प्रकाशित हुई।

भारत में डचों का आगमन
  • परिचय: डच लोग हॉलैंड (नीदरलैंड) के निवासी थे। उनका मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्वी एशिया के मसाला बाजारों में सीधा प्रवेश पाना था।
  • कंपनी की स्थापना: 10 मार्च, 1602 को एक राजकीय घोषणा के जरिए "यूनाइटेड ईस्ट इण्डिया कम्पनी ऑफ द नीदरलैण्ड" की स्थापना हुई।
  • प्रथम नागरिक: भारत आने वाला पहला डच नागरिक कार्नोलिस-ड-हस्तमान (1596 ई.) था।


डचों की महत्वपूर्ण कोठियाँ (फैक्ट्रियां) और इतिहास
  • प्रथम कारखाना: डचों ने भारत में अपना पहला कारखाना 1605 ई. में मछलीपट्टनम में स्थापित किया था।
  • मुख्यालय: भारत में डचों का मुख्य प्रशासनिक केंद्र या मुख्यालय नागपट्टनम था।
  • पतन (बेदारा का युद्ध): भारत में डच शक्ति का अंतिम रूप से पतन 1759 ई. में अंग्रेजों और डचों के बीच हुए 'बेदारा के युद्ध' से हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजी सेना का नेतृत्व कर्नल फोर्ड ने किया था।
  • प्रमुख पद: डच फैक्ट्रियों के प्रमुख को "फैक्टर" कहा जाता था।
  • व्यापारिक प्रणाली: भारत में सर्वप्रथम संयुक्त पूँजी कम्पनी (Joint Stock Company) डचों ने ही शुरू की थी और यह सहकारी प्रणाली पर आधारित थी।
  • किलेबंदी: डचों ने 1653 ई. में चिनसुरा में "गुस्तावुस" (Gustavus) और कोच्चि में "फोर्ट विलियम" नामक किलों का निर्माण करवाया था।
ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना और शुरुआती कदम
  • स्थापना: 31 दिसंबर, 1600 को इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ-I ने एक चार्टर के माध्यम से 'द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ लंदन ट्रेडिंग इनटू द ईस्ट इंडीज' (ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का अधिकार दिया।
  • प्रथम अंग्रेज: भारत आने वाला पहला अंग्रेज नागरिक थॉमस स्टीफेंस था, जो 1579 में गोवा पहुँचा था।
  • मुगल दरबार में दूत:
    • 1608: सम्राट जेम्स प्रथम ने कैप्टन हॉकिन्स को जहांगीर के दरबार में भेजा।
    • 1615: सर थॉमस रो जहांगीर के दरबार में व्यापारिक रियायतें प्राप्त करने के लिए आए।
व्यापारिक केंद्रों का विस्तार
  • मछलीपत्तनम (1611): दक्षिण-पूर्वी तट पर अंग्रेजों ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी (फैक्ट्री) स्थापित की।
  • सूरत (1609): हॉकिन्स ने जहांगीर से सूरत में बसने की अनुमति मांगी थी।
  • मद्रास (1639): अंग्रेजों ने चंद्रगिरि के राजा से मद्रास पट्टे पर लिया और वहाँ फोर्ट सेंट जॉर्ज की किलेबंदी की।
  • हुगली (1651): बंगाल में राजकुमार शुजा की अनुमति से पहली कोठी स्थापित की गई।
महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ
  • बॉम्बे का अधिग्रहण (1661): इंग्लैंड के सम्राट चार्ल्स-II का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन से हुआ, जिसमें उन्हें बॉम्बे दहेज में मिला। बाद में (1668 में) उन्होंने इसे 10 पाउंड वार्षिक किराये पर कंपनी को दे दिया।
  • कलकत्ता की नींव (1698): सूबेदार अजीमुशान से कंपनी ने 12,000 रुपये में सुतानाती, कलकत्ता और गोविंदपुर की ज़मींदारी प्राप्त की, जिससे आधुनिक कलकत्ता का विकास हुआ।
  • कोलकाता और मुंबई का इतिहास
    • कोलकाता: 1700 ई. तक जॉब चारनॉक ने कोलकाता को विकसित किया। यहीं फोर्ट विलियम की स्थापना हुई और इसके पहले गवर्नर चार्ल्स आयर बने।
    • मुंबई: गेराल्ड अंगियार (1669-1677 ई.) को मुंबई का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। 1687 ई. तक मुंबई पश्चिमी तट का मुख्य व्यापारिक केंद्र बन गया था। अंगियार के बाद रोल्त (1677-82 ई.) उत्तराधिकारी बना।
    महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ और पुस्तकें
    • गवर्नर-इन-काउंसिल: कंपनी के व्यापार की देख-रेख इसी परिषद द्वारा की जाती थी।
    • थॉमस रो: इनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम "पूर्वी द्वीपों की यात्रा" है।
    • बंगाल: बंगाल के प्रथम अंग्रेज गवर्नर विलियम हेजेज थे।

    डेन (Danish) ईस्ट इंडिया कंपनी
    • स्थापना: 1616 ई. में हुई।
    • व्यापारिक केंद्र: इन्होंने 1620 ई. में त्रैकोवार (तमिलनाडु) और 1667 ई. में सेरामपुर (बंगाल) में अपनी फैक्ट्रियां स्थापित कीं।
    • अंत: 1845 ई. में डेन लोगों ने अपनी कंपनी अंग्रेजों को बेच दी।

भारत में फ्रांसीसियों के आगमन 
फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना
  • समय: 1664 ई. में फ्रांस के सम्राट लुई 14वें के मंत्री कोलबर्ट के प्रयासों से इसकी स्थापना हुई।
  • प्रकृति: यह एक सरकारी व्यापारिक कंपनी थी जो पूरी तरह से सरकारी आर्थिक सहायता पर निर्भर थी।
मुख्य व्यापारिक केंद्र (कोठियाँ)
  • सूरत (1668 ई.): फ्रांसीसियों ने अपनी पहली व्यापारिक कोठी फ्रेंको कैरो के नेतृत्व में सूरत में स्थापित की।
  • मछलीपट्टनम (1669 ई.): दूसरी कोठी गोलकुंडा के सुल्तान से अधिकार-पत्र प्राप्त करने के बाद यहाँ बनाई गई।
  • चंद्रनगर (1690-92 ई.): बंगाल के नवाब शाइस्ता खाँ द्वारा दी गई जगह पर इसकी स्थापना हुई।
पुडुचेरी (पांडिचेरी) का विकास
  • 1673 ई. में फ्रेंक मार्टिन और बेलागर-द-लेस्पिन ने वलिकोण्डपुरम के मुस्लिम सूबेदार शेर खाँ लोदी से एक छोटा गाँव 'पुडुचेरी' प्राप्त किया।
  • फ्रेंको मार्टिन पांडिचेरी का प्रथम गवर्नर बना और उसने यहाँ फोर्ट तुई का निर्माण कराया।
महत्वपूर्ण तथ्य और बदलाव
  • विलियम नोरिस: औरंगजेब के दरबार में आने वाला अंग्रेज राजदूत था।
  • इंटरलोपर: एशिया में मुक्त व्यापार करने वाले अंग्रेज व्यापारियों को कहा जाता था।
  • डुप्ले: वह पहला फ्रांसीसी गवर्नर था जिसने भारत में यूरोपीय साम्राज्य (उपनिवेश) की नींव रखी।
  • नीति में बदलाव: 1742 ई. तक फ्रांसीसियों का मुख्य उद्देश्य व्यापारिक लाभ था, लेकिन डुप्ले के गवर्नर बनने के बाद राजनीतिक लाभ उनके लिए व्यापार से अधिक महत्वपूर्ण हो गया।

बंगाल में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना
  • मुरशिद कुली खाँ: 1717 ई. में मुगल गवर्नर के रूप में नियुक्त हुए और बंगाल में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।
  • सिराजुद्दौला: अलीवर्दी खाँ के बाद 1756 ई. में बंगाल के नवाब बने। अंग्रेजों के साथ उनके मतभेदों के कारण 1757 ई. में प्लासी का युद्ध हुआ।
अंग्रेजों के साथ मतभेद के कारण
  1. कंपनी द्वारा 'दस्तक' (व्यापार परमिट) का दुरुपयोग।
  2. किलेबंदी (Fortification) रोकने के नवाब के आदेशों की अंग्रेजों द्वारा अवहेलना।
  3. नवाब के दरबार में अंग्रेजों का पेश न होना।
  4. नवाब के विरोधियों (जैसे घसीटी बेगम) के साथ अंग्रेजों का षडयंत्र।
  5. नवाब के शत्रुओं को शरण देना।

ब्लैक होल दुर्घटना (20 जून, 1756)
  • पृष्ठभूमि: नवाब ने कासिम बाज़ार की कोठी और फोर्ट विलियम पर हमला कर उन पर कब्ज़ा कर लिया।
  • घटना: बताया जाता है कि 146 अंग्रेज कैदियों को एक छोटे कमरे (14 फीट 10 इंच) में बंद कर दिया गया था। अत्यधिक गर्मी और दम घुटने के कारण अगली सुबह केवल 23 कैदी ही जीवित बचे।
  • उल्लेख: ब्रिटिश इतिहासकार हॉलवेल ने अपनी पुस्तक "Alive the wonder" में इस घटना का वर्णन किया है।

अलीनगर की संधि
यह संधि रॉबर्ट क्लाइव और एडमिरल वॉटसन के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना द्वारा कलकत्ता (अब कोलकाता) पर फिर से नियंत्रण प्राप्त करने के बाद, बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी।
संधि की मुख्य शर्तें:
  • व्यापारिक अधिकार: अंग्रेजों को उनके पुराने व्यापारिक विशेषाधिकार और सुविधाएं वापस मिल गईं।
  • सिक्के ढालना: ब्रिटिश कंपनी को अपने स्वयं के सिक्के ढालने (mint coins) का अधिकार दिया गया।
  • किलेबंदी: अंग्रेजों को कलकत्ता की किलेबंदी (fortification) करने की अनुमति मिली।
  • हर्जाना: नवाब ने युद्ध के नुकसान की भरपाई के लिए अंग्रेजों को एक बड़ी राशि का भुगतान किया।
  • सुरक्षा का वादा: इसके बदले में, अंग्रेजों ने नवाब को सुरक्षा का आश्वासन दिया।
यह संधि इतिहास में महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने भविष्य में होने वाले प्लासी के युद्ध (Battle of Plassey) का आधार तैयार किया था।
प्लासी का युद्ध
प्लासी का युद्ध (23 जून, 1757)
  • षड्यंत्र: रॉबर्ट क्लाइव ने बंगाल पर नियंत्रण पाने के लिए नवाब के सेनापति मीर जाफर, जगत सेठ, राय दुर्लभ और अमीरचन्द के साथ मिलकर एक साजिश रची। इस समझौते के तहत युद्ध के बाद मीर जाफर को नवाब बनाना तय हुआ।
  • युद्ध की स्थिति: युद्ध मुर्शिदाबाद के दक्षिण में प्लासी के मैदान में हुआ। यह केवल एक औपचारिकता थी क्योंकि मीर जाफर और राय दुर्लभ की सेनाओं ने युद्ध में हिस्सा ही नहीं लिया।
  • परिणाम: अपनी बड़ी सेना के बावजूद नवाब सिराजुद्दौला को भागना पड़ा और बाद में उनकी हत्या कर दी गई।

युद्ध के परिणाम
  • नया नवाब: युद्ध के बाद मीर जाफर बंगाल का नवाब बना। उसने ईस्ट इंडिया कंपनी को कलकत्ता पर हमले के मुआवज़े के रूप में 1,77,00,000 रुपये दिए।
  • कंपनी को लाभ: कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा में मुफ्त व्यापार का अधिकार मिला। साथ ही, बंगाल के 24 परगना की ज़मींदारी भी मिली, जिससे कंपनी भारत में एक क्षेत्रीय शक्ति बन गई।
  • सत्ता परिवर्तन (1760): कंपनी की और धन पाने की लालसा बढ़ती गई। जब मीर जाफर इसे पूरा नहीं कर पाया, तो कंपनी ने उसके दामाद मीर कासिम के साथ गुप्त समझौता कर 1760 में मीर जाफर को सिंहासन छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
  • प्रमुख व्यक्ति: युद्ध के समय बंगाल का गवर्नर रोजर ड्रेक था और ब्रिटिश सेना का नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव ने किया था।
महत्वपूर्ण कथन
  • पी.ई. रॉबर्ट: "प्लासी की विजय विश्वासघात थी।"
  • पत्रिकर: "प्लासी एक सौदा था।"

मीर कासिम और वेन्सिटार्ट की संधि (सितम्बर, 1760)
संधि के मुख्य प्रावधान
  • क्षेत्रीय रियायतें: नवाब ने कम्पनी को बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव के जिले सौंपने का वादा किया।
  • व्यापारिक लाभ: सिलहट के चूने के व्यापार में 3 वर्षों तक कम्पनी की 50% (आधी) हिस्सेदारी तय की गई।
  • वित्तीय सहायता: मीर कासिम ने कम्पनी के दक्षिण (South) अभियानों के लिए 5 लाख रुपये की सहायता देना स्वीकार किया।
  • सैन्य और आंतरिक नीति:
    • कम्पनी नवाब के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगी।
    • कम्पनी नवाब को आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता प्रदान करेगी।
  • विदेशी नीति: मीर कासिम कम्पनी के दोस्तों को अपना दोस्त और उसके दुश्मनों को अपना दुश्मन मानेगा।
22-23 अक्टूबर, 1764 को हुए बक्सर के युद्ध
युद्ध के मुख्य कारण
  • मीर कासिम और कंपनी का विवाद: मीर कासिम ने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित कर दी और भारतीय व्यापारियों को कर-मुक्त व्यापार की अनुमति दे दी, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हितों के विरुद्ध था।
  • गठबंधन का निर्माण: मीर कासिम ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला और मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ गठबंधन बनाया।
युद्ध और परिणाम
  • निर्णायक हार: हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने बक्सर के युद्ध में तीनों की संयुक्त सेना को पराजित किया।
  • इलाहाबाद की संधियाँ (1765):
    • प्रथम संधि (12 अगस्त): मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी (राजस्व वसूलने का अधिकार) दे दी। बदले में उन्हें 26 लाख रुपये वार्षिक पेंशन दी गई।
    • द्वितीय संधि (16 अगस्त): नवाब शुजाउद्दौला ने इलाहाबाद और कड़ा के इलाके कंपनी को सौंप दिए और 50 लाख रुपये युद्ध हर्जाने के रूप में दिए।
महत्वपूर्ण प्रभाव
  • दोहरा शासन (Dual Government): बंगाल में शासन की एक नई व्यवस्था शुरू हुई जहाँ नवाब के पास प्रशासन की जिम्मेदारी थी, लेकिन वास्तविक शक्ति (राजस्व और सेना) कंपनी के पास थी।
  • ऐतिहासिक मत: इतिहासकार वी.ए. स्मिथ के अनुसार, "बक्सर के युद्ध ने प्लासी के अधूरे कार्यों को पूरा किया।" यह युद्ध सैन्य और राजनीतिक दृष्टि से प्लासी से अधिक निर्णायक माना जाता है।
नोट: बक्सर के युद्ध के समय मीर जाफर बंगाल का नवाब था।
सहायक संधि-लॉर्ड वेलेजली
सहायक संधि की प्रमुख शर्तें:
  • ब्रिटिश अनुमति: संधि स्वीकार करने वाले भारतीय शासक ब्रिटिश अनुमति के बिना किसी अन्य शक्ति से न तो युद्ध कर सकते थे और न ही कोई संबंध रख सकते थे।
  • ब्रिटिश सेना की तैनाती: राज्य की आंतरिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए वहां एक ब्रिटिश सेना रखी जाती थी, जिसका नियंत्रण ब्रिटिश जनरल के पास होता था।
  • खर्च का वहन: सेना के खर्च के बदले राज्य को या तो अपने क्षेत्र का एक हिस्सा कंपनी को देना पड़ता था या फिर वार्षिक अनुदान (पैसा) देना पड़ता था।
  • सुरक्षा का वादा: इसके बदले में ब्रिटिश कंपनी उस राज्य को बाहरी आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करती थी।

संधि स्वीकार करने वाले प्रमुख राज्य:
राज्यवर्ष
हैदराबाद1798 (प्रथम राज्य)
मैसूर1799
अवध1801
पेशवा1802
डलहौजी की व्यपगत नीति (Doctrine of Lapse)
डलहौजी की व्यपगत नीति (Doctrine of Lapse)
  • मुख्य उद्देश्य: ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करना।
  • सिद्धांत: यदि किसी भारतीय राज्य का कोई स्वाभाविक या आनुवंशिक उत्तराधिकारी नहीं होता था, तो ब्रिटिश सरकार उस राज्य को अपने साम्राज्य में मिला लेती थी।
  • दत्तक पुत्र का नियम: गोद लिए गए पुत्र को उत्तराधिकारी तभी माना जाता था जब ब्रिटिश सरकार उसे अनुमति दे।
  • कुशासन का आरोप: इसके तहत राज्यों को भ्रष्टाचार या खराब शासन का आरोप लगाकर भी हड़प लिया जाता था।
महत्वपूर्ण विलय (Annexations)
वर्षराज्य/रियासतटिप्पणी
1848सताराइस नीति के तहत विलय किया गया पहला राज्य।
1849संभलपुर और जैतपुर-
1850बघाट-
1852उदयपुर-
1853झांसीउत्तराधिकारी न होने के कारण।
1854नागपुर-
1856अवधकुशासन के आधार पर ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल।
विशेष नोट: लॉर्ड डलहौजी ने अवध के बारे में कहा था- "ये गिलास फल (चेरी) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।" साथ ही, 1849 ई. में पंजाब का भी विलय किया गया था।



     

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