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 आधुनिक राजस्थान का इतिहास: ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव और घटनाएँ

आधुनिक राजस्थान का इतिहास


राजस्थान, जो भारतीय उपमहाद्वीप का एक प्रमुख राज्य है, अपनी धरोहर और संस्कृति के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन इस क्षेत्र का इतिहास ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव से प्रभावित हुआ था, खासकर जब ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) ने भारतीय राजनीति में अपनी जड़े जमाई। इस ब्लॉग में हम आधुनिक राजस्थान के इतिहास की चर्चा करेंगे, जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव से लेकर ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा राजस्थान की रियासतों पर किए गए हस्तक्षेप और संधियों तक की घटनाओं का विवरण दिया जाएगा।

1. ब्रिटिश साम्राज्य का आगमन और ईस्ट इंडिया कंपनी का गठन

ब्रिटिश साम्राज्य की भारत में पहली बार उपस्थिति 1600 में हुई थी, जब ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ ने एक रॉयल ऑर्डर के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC) को एक अधिकार पत्र प्रदान किया। इस अधिकार पत्र ने ब्रिटिश व्यापारियों को भारत में व्यापार करने का अधिकार दिया और साथ ही भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव रखी।

1.1. ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में विस्तार

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना 1757 में शुरू किया, जब कंपनी ने प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला को हराया। इस युद्ध के बाद, कंपनी ने बंगाल में अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ाया और धीरे-धीरे भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी सत्ता स्थापित की।

2. बक्सर युद्ध और कंपनी का राजनीतिक प्रभुत्व

1757 के प्लासी युद्ध में विजय के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1764 में बंगाल के नवाब मीर कासिम और उनके गठबंधन को बक्सर के युद्ध में हराया। इस युद्ध ने कंपनी को भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी राजनीतिक शक्ति स्थापित करने का अवसर दिया। इसके बाद, कंपनी ने भारत के अन्य क्षेत्रों में भी अपनी ताकत बढ़ाई।

2.1. अन्य प्रमुख युद्ध

  • बेदारा का युद्ध (1759): यह युद्ध भी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जहां उसने मराठों के खिलाफ संघर्ष किया।
  • बांदीवास का युद्ध (1760): इस युद्ध में कंपनी ने मराठों के खिलाफ जीत हासिल की और उनका दबदबा घटा दिया।

2.2. इलाहाबाद संधि

इलाहाबाद संधि (1765) ने ब्रिटिश साम्राज्य को भारत में एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित किया। इस संधि के द्वारा ब्रिटिशों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवानी अधिकार प्राप्त हुआ, जिससे कंपनी को इन प्रदेशों से राजस्व प्राप्त होने लगा।

3. रेग्युलेटिंग एक्ट और वारेन हेस्टिंग्स की नीति

1773 में, ब्रिटिश सरकार ने रेग्युलेटिंग एक्ट लागू किया, जिसमें वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का प्रथम गवर्नर जनरल नियुक्त किया गया। हेस्टिंग्स ने भारतीय राज्य के प्रशासन को सुदृढ़ करने के लिए कई सुधार किए।

3.1. नीति of Ring Fence

वारेन हेस्टिंग्स की "Ring Fence" नीति ने ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय राजनीति में और भी मजबूती से स्थापित किया। इस नीति के अंतर्गत, कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपने चारों ओर बफर (मध्यस्थ) राज्य बनाने की कोशिश की, ताकि वह बड़े भारतीय शक्तियों के आक्रमण से बच सके।

4. राजस्थान में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव

4.1. सहायक संधि और राजस्थान की रियासतें

राजस्थान में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ा और कंपनी ने कई रियासतों से सहायक संधि की। सबसे पहले, 1803 में भरतपुर के राजा रणजीत सिंह ने कंपनी के साथ सहायक संधि की। इसके बाद, 1803 में अलवर और धौलपुर रियासतों ने भी ब्रिटिश साम्राज्य के साथ यह संधि की।

सहायक संधि के तहत, इन रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ मित्रता बनाए रखने का वचन देना पड़ा और ब्रिटिश साम्राज्य से सैन्य सहायता प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हुआ।

4.2.  अधीनस्थ पृथक्करण की संधि: लॉर्ड हेस्टिंग्स

अधीनस्थ पृथक्करण की संधि (Subsidiary Alliance) को 1813 में ब्रिटिश गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स द्वारा लागू किया गया था। इस संधि का उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को भारतीय राज्यों में और अधिक राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करना था। इस नीति का प्रारूप दिल्ली के रेजीडेंट चार्ल्स मैटकॉफ ने तैयार किया।

इस नीति के अंतर्गत, भारतीय रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ संधि करनी पड़ी, जिसके तहत वे ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी का वचन देते थे और अपनी स्वतंत्रता का एक हिस्सा खो देते थे। इन रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य से सैन्य सहायता प्राप्त होती थी और वे अपनी आंतरिक और बाहरी राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए ब्रिटिश सरकार की मध्यस्थता स्वीकार करते थे।

4.2.2. संधियों में शामिल होने वाली प्रमुख रियासतें

अधीनस्थ पृथक्करण की संधि के तहत राजस्थान की कई रियासतों ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ संधि की। इन संधियों ने ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव को राजस्थान में और भी मजबूत किया और रियासतों को उनकी स्वतंत्रता में सीमित कर दिया। निम्नलिखित रियासतों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए:

  • 9 नवम्बर 1817: करौली - महाराजा हरपक्षपाल सिंह
  • 15 नवम्बर 1817: टोंक - अमीर खाँ पिण्डारी
  • 26 दिसम्बर 1817: कोटा - महाराजा उम्मेद सिंह
  • 9 जनवरी 1818: मारवाड़ - महाराजा मानसिंह राठौड़
  • 22 जनवरी 1818: उदयपुर - महाराजा भीमसिंह
  • 10 फरवरी 1818: बूंदी - महाराजा किशनसिंह
  • 21 मार्च 1818: बीकानेर - महाराजा सूरतसिंह
  • 7 अप्रैल 1818: किशनगढ़ - महाराजा कल्याण सिंह
  • 15 अप्रैल 1818: जयपुर - महाराजा जगतसिंह
  • 5 अक्टूबर 1818: प्रतापगढ़ - महाराजा सांगतसिंह
  • 25 दिसम्बर 1818: बांसवाड़ा - महाराजा उम्मेद सिंह
  • 2 जनवरी 1819: जैसलमेर - महाराजा मूलराज
  • 11 सितम्बर 1823: सिरोही - महाराजा शिवसिंह
  • 10 अप्रैल 1838: झालावाड़ - महाराजा मदनसिंह (यह संधि अंग्रेजी सरकार द्वारा राजस्थान की नवीनतम रियासत के रूप में लागू की गई थी)

इन संधियों के माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य ने भारतीय राज्यों पर अपना राजनीतिक और सैन्य नियंत्रण स्थापित किया। इन रियासतों को उपनिवेश के रूप में नियंत्रित किया गया, जिससे ब्रिटिश साम्राज्य का भारत में प्रभुत्व और मजबूत हुआ।

2.4. संधियों का प्रभाव

अधीनस्थ पृथक्करण की संधियों का राजस्थान की रियासतों पर गंभीर प्रभाव पड़ा। इन संधियों ने न केवल रियासतों की राजनीतिक स्वतंत्रता को सीमित किया, बल्कि उन्होंने इन राज्यों के शासकों के लिए ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादारी और उनके द्वारा सैन्य सहायता प्रदान करने के दायित्वों को भी अनिवार्य बना दिया। इसके परिणामस्वरूप, इन रियासतों को अपने आंतरिक मामलों में भी ब्रिटिश साम्राज्य के हस्तक्षेप को स्वीकार करना पड़ा, जिससे उनकी स्वतंत्रता और शक्ति में और कमी आई।

यह संधि एक प्रकार से राजस्थान की रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन लाने की एक रणनीति थी, जिसमें स्थानीय शासकों को अपनी सत्ता में सीमित अधिकारों के साथ ब्रिटिश साम्राज्य की मदद से शांति बनाए रखने की जिम्मेदारी दी गई।


4.3. प्रमुख संधियाँ और रियासतें

  • 9 नवंबर 1817: करौली के महाराजा हरपक्षपाल सिंह ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • 15 नवंबर 1817: टोंक के अमीर खाँ पिण्डारी ने संधि की।
  • 9 जनवरी 1818: मारवाड़ के महाराजा मानसिंह राठौड़ ने संधि की।
  • 22 जनवरी 1818: उदयपुर के महाराजा भीमसिंह ने संधि की।
  • 5 अक्टूबर 1818: प्रतापगढ़ के सांगतसिंह ने भी संधि की।

4.4. राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप और आर्थिक संकट

ब्रिटिश साम्राज्य ने राजस्थान में मराठा हस्तक्षेप को रोकने के लिए कई रियासतों से संधियाँ कीं। साथ ही, पिंडारियों और शासकों के आपसी झगड़ों के कारण राजस्थान की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। इस समय कई रियासतों की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गई और उनका प्रशासन भी कमजोर हो गया।

5. ब्रिटिश साम्राज्य का अंतिम दौर और राजस्थान की स्थिति

ब्रिटिश साम्राज्य ने राजस्थान की रियासतों में अपनी शक्ति को और मजबूत किया। 1823 में, सिरोही के राज्य ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ अंतिम अधीनस्थ संधि की।

इस प्रकार, ब्रिटिश साम्राज्य ने राजस्थान की रियासतों में अपनी राजनीति, शासन और आर्थिक नीतियों के माध्यम से बहुत बड़ा प्रभाव डाला।

5.1. राजस्थान के शासकों के संघर्ष और ब्रिटिश साम्राज्य की भूमिका

राजस्थान के शासकों ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ संधियाँ की, लेकिन साथ ही वे अपनी स्वतंत्रता और शक्ति को बनाए रखने के लिए संघर्ष करते रहे। ब्रिटिश साम्राज्य ने इन संघर्षों का फायदा उठाते हुए इन रियासतों को अपने अधीन कर लिया।


राजस्थान का इतिहास ब्रिटिश साम्राज्य के साथ गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर ब्रिटिश राज तक, राजस्थान की रियासतों पर ब्रिटिश साम्राज्य के प्रभाव ने यहाँ के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढाँचे को बदल दिया। सहायक संधियाँ, अधीनस्थ संधियाँ, और ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियाँ राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुईं।

राजस्थान का यह दौर हमें यह सिखाता है कि किस प्रकार विदेशी ताकतों ने भारतीय राज्यों की राजनीति में हस्तक्षेप किया और धीरे-धीरे अपनी सत्ता स्थापित की।

Sources:

  • किताबें और ऐतिहासिक दस्तावेज़
  • स्थानीय इतिहास के विशेषज्ञ

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