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 बनास सभ्यता और संस्कृति: राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहर

बनास सभ्यता और संस्कृति: राजस्थान की ऐतिहासिक धरोहर



राजस्थान, जो अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध है, में अनेक प्राचीन सभ्यताओं और संस्कृतियों का वास रहा है। इन सभ्यताओं ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। विशेष रूप से, बनास सभ्यता और इसके संबंधित स्थलों का अध्ययन भारतीय पुरातत्त्व में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस लेख में, हम राजस्थान की प्रमुख प्राचीन सभ्यताओं, जैसे आहड़ सभ्यता, गणेश्वर सभ्यता, बैराठ सभ्यता, और अन्य महत्वपूर्ण स्थलों के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे।

आहड़ सभ्यता - उदयपुर

ताम्रपाषाण काल से संबंधित

आहड़ सभ्यता राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित है। यह सभ्यता ताम्रपाषाण काल (Copper Age) से संबंधित है, जो प्राचीन भारतीय सभ्यताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। आहड़ सभ्यता को ताम्रपाषाण काल की सभ्यता के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यहाँ ताम्र (Copper) और अन्य धातुओं के उपकरण पाए गए थे।

स्थिति और अन्य नाम

आहड़ सभ्यता बनास नदी घाटी में स्थित है, जो उदयपुर शहर के पास है। इसका प्राचीन नाम ताम्रवती था, जिसे बाद में आधाटपुर और आधाट दुर्ग (10-11वीं सदी के लेखों में) के रूप में भी संदर्भित किया गया है।

खोज और उत्खनन

आहड़ सभ्यता की खोज 1953 ई. में अक्षयकीर्ति व्यास द्वारा की गई थी। इसके बाद, 1956 में रत्नचन्द्र अग्रवाल द्वारा पहली बार उत्खनन कार्य शुरू किया गया। इस उत्खनन में आहड़ से बड़ी मात्रा में ताम्रधातु, मृद्भाण्ड, और अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए थे। इसके अलावा, 1961-62 में डॉ. एच. डी. साकलिया और वी. एन. मिश्रा ने इस स्थल का और गहराई से अध्ययन किया और कई महत्वपूर्ण तथ्य उजागर किए।

प्राप्त सामग्री और जीवनशैली

आहड़ से प्राप्त सामग्री और उत्खनन से संबंधित जानकारी यह दर्शाती है कि आहड़ के निवासी मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन और आखेट (शिकार) से जुड़े थे। यहाँ के लोग गेहूँ, ज्वार, और चावल जैसी खाद्यान्न फसलों का उपयोग करते थे।

  1. आधुनिक आवास: आहड़ के मकान आयताकार होते थे, जिनमें 2-3 कमरे होते थे। इन मकानों में रसोई भी होती थी, जिसमें 3 मुंह वाला चूल्हा पाया गया। रसोई में बलुआ पत्थर के सिलबट्टे भी मिले हैं, जिनका उपयोग खाद्य सामग्री को पीसने के लिए किया जाता था।

  2. मांसाहारी जीवनशैली: उत्खनन से यह भी पता चलता है कि आहड़ के लोग मांसाहारी थे। यहाँ से मछली, बकरी, हिरण और गाय की हड्डियाँ प्राप्त हुईं, जो यह दर्शाती हैं कि ये लोग मांस का सेवन करते थे।

  3. आभूषण और धातुकर्म: आहड़ के लोग ताम्र धातुकर्मी थे। यहाँ के एक घर से तांबा गलाने की भट्टी भी प्राप्त हुई है। इसके अलावा, यहाँ से ताम्बे की कुल्हाड़ी, चूड़ियाँ, चद्रें आदि प्राप्त हुई हैं, जो यह दर्शाती हैं कि इन लोगों ने ताम्र के विभिन्न उपकरणों का निर्माण किया था। इसके साथ ही, मिट्टी के मनकों से बने आभूषण भी यहाँ पाए गए हैं।

  4. वाणिज्य और व्यापार: यहाँ से प्राप्त तौल के बाट और माप यह संकेत देते हैं कि आहड़ में व्यापार और वाणिज्य का भी विकास हुआ था। इसके अलावा, यहाँ से तांबे की मुद्राएँ भी प्राप्त हुई हैं, जिन पर विभिन्न आकृतियाँ उकेरी गई थीं। इनमें से एक मुद्रा पर त्रिशूल की आकृति और दूसरी पर यूनानी देवता अपोलो की छवि दिखाई गई है, जो यूनानी सम्पर्क को दर्शाती है।

सांस्कृतिक महत्व

आहड़ सभ्यता की सांस्कृतिक विशेषताएँ यह दर्शाती हैं कि यहाँ के लोग कृषि, पशुपालन, मांसाहार और ताम्रधातु के उपकरणों का उपयोग करते थे। इसके अलावा, आभूषणों का संग्रह और व्यापार के संकेत यह दिखाते हैं कि यह सभ्यता अपने समय में एक उन्नत और समृद्ध सभ्यता थी।


गणेश्वर सभ्यता - सीकर

गणेश्वर सभ्यता राजस्थान के सीकर जिले के कांतली नदी के किनारे स्थित है। यह सभ्यता ताम्रपाषाण काल से संबंधित है और इसे भारतीय प्राचीन सभ्यताओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।

खोज और उत्खनन

गणेश्वर सभ्यता की खोज 1977-78 ई. में रत्नचन्द्र अग्रवाल और श्री विजयकुमार द्वारा की गई थी। इसके बाद, इस स्थल का उत्खनन किया गया और यहाँ से ताम्र उपकरण, ताम्र आयुध, काले और नीले रंग के मृद्भाण्ड जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए। गणेश्वर से प्राप्त छल्लेदार मिट्टी के बर्तन केवल यहाँ पाए गए हैं और यह इस स्थल की विशिष्टता को दर्शाते हैं।

सांस्कृतिक महत्व

गणेश्वर के लोग कृषि, पशुपालन और आखेट (शिकार) से संबंधित थे। यहाँ के मकानों में पत्थर का प्रयोग हुआ था और यहाँ के लोग अपने गाँव को बाढ़ से बचाने के लिए पत्थर के बांध बनाते थे। इसके अलावा, यहाँ से ताम्र उपकरण और ताम्र आयुध की बड़ी मात्रा प्राप्त हुई है, जो यह दर्शाते हैं कि यह स्थल ताम्रकालीन संस्कृतियों का प्रमुख प्रतिनिधि था।

गणेश्वर में पाए गए काले और नीले रंग के मृद्भाण्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ये मृद्भाण्ड इस सभ्यता की कला और संस्कृति को दर्शाते हैं।


बैराठ सभ्यता - जयपुर

बैराठ सभ्यता जयपुर जिले के शाहपुरा उपखंड में स्थित है। यह क्षेत्र पाषाणकाल से लेकर ऐतिहासिक काल तक के अवशेषों से समृद्ध है।

खोज और उत्खनन

  • खोज: 1936-37 ई. में दयाराम साहनी द्वारा की गई।
  • उत्खनन: 1962-63 ई. में नीलरत्न बनर्जी और कैलाश नाथ दीक्षित द्वारा किया गया।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

बैराठ सभ्यता का ऐतिहासिक महत्व महाभारत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि बैराठ क्षेत्र में पांडवों ने अपना एक वर्ष का अज्ञातवास व्यतीत किया था। इसके अलावा, बैराठ का उल्लेख बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। इस क्षेत्र में मौर्यकाल के समय बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ था और यहाँ से अशोक कालीन बौद्ध अभिलेख प्राप्त हुए हैं।

यहाँ से प्राप्त चांदी के पंचमार्क सिक्के और इंडोग्रीक शासकों की मुद्राएँ बैराठ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को और अधिक स्पष्ट करती हैं। इसके अलावा, बैराठ क्षेत्र के उत्खनन से कुफिक लेखन और बौद्ध विहार के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र के बौद्ध धर्म से संबंध को दर्शाते हैं।


अन्य प्रमुख सभ्यताएँ और स्थल

तरखान वाला डेरा - गंगानगर

तरखान वाला डेरा का स्थल गंगानगर में स्थित है। यहाँ से हड़प्पा सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह स्थल प्राचीन हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों से जुड़ा हुआ है और इसे विकसित हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख हिस्सा माना जाता है।

करणपुरा - हनुमानगढ़

करणपुरा स्थल, जो हनुमानगढ़ जिले में स्थित है, से प्राक और विकसित हड़प्पा सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर उत्खनन कार्य 2012-13 में किया गया था और इस स्थल से भी कई महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अवशेष मिले थे।


राजस्थान में स्थित ताम्र पाषाण युगीन स्थल

राजस्थान में ताम्र पाषाण युगीन सभ्यताओं के कई महत्वपूर्ण स्थल हैं, जो प्राचीन भारतीय सभ्यताओं और उनके विकास के संकेतक हैं। इन स्थलों से विभिन्न ताम्र उपकरण, मृद्भाण्ड और अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो प्राचीन मानव सभ्यता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। यहाँ हम राजस्थान के कुछ प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थलों की चर्चा करेंगे।

1. आहड़ (उदयपुर)

आहड़, जो उदयपुर जिले में स्थित है, ताम्र पाषाण काल से संबंधित एक महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ से ताम्रधातु, मृद्भाण्ड और अन्य विभिन्न सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं। यह स्थल विशेष रूप से अपनी कृषि आधारित सभ्यता के लिए प्रसिद्ध है, जहां ताम्र पाषाण के उपकरणों का प्रयोग किया जाता था। आहड़ के निवासी मांसाहारी थे और उनके जीवन में कृषि, पशुपालन और आखेट का प्रमुख स्थान था।

2. झाडोल (उदयपुर)

झाडोल, जो उदयपुर जिले में स्थित है, एक और महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ से भी ताम्र उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष मिले हैं, जो ताम्र पाषाण काल की सभ्यता का प्रमाण प्रदान करते हैं।

3. गिलूंड (राजसमंद)

गिलूंड, जो राजसमंद जिले में स्थित है, एक प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ पर ताम्र उपकरण, मृद्भाण्ड, और अन्य कई सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता की समृद्धि को दर्शाते हैं।

4. पहुमता (राजसमंद)

पहुमता, जो राजसमंद जिले में स्थित है, एक और महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण स्थल है। यहाँ के उत्खनन से ताम्रधातु और अन्य सांस्कृतिक सामग्री प्राप्त हुई है, जो इस स्थल के प्राचीनकाल के जीवन और संस्कृति को उजागर करती है।

5. बालाथल (उदयपुर)

बालाथल, जो उदयपुर जिले में स्थित है, भी ताम्र पाषाण युग के एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ से ताम्र उपकरण, मृद्भाण्ड और अन्य सामग्री प्राप्त हुई हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता का प्रमाण देती हैं।

6. गणेश्वर (सीकर)

गणेश्वर, जो सीकर जिले में स्थित है, एक प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ पर ताम्रधातु के औजारों और आयुधों के साथ-साथ काले और नीले रंग के मृद्भाण्ड भी प्राप्त हुए हैं। यह स्थल ताम्र पाषाण काल की सभ्यता का प्रमुख प्रतिनिधि स्थल है।

7. मलाह (भरतपुर)

मलाह, जो भरतपुर जिले में स्थित है, एक और महत्वपूर्ण ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ से विभिन्न ताम्रधातु उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो प्राचीन सभ्यता के समृद्धि को दर्शाते हैं।

8. कोल - माहोली (सवाई माधोपुर)

कोल - माहोली, जो सवाई माधोपुर जिले में स्थित है, ताम्र पाषाण युग के एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ के उत्खनन से ताम्रधातु के उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

9. किराडोल - चीथवाड़ी (जयपुर)

किराडोल और चीथवाड़ी, जो जयपुर जिले में स्थित हैं, ताम्र पाषाण युग के महत्वपूर्ण स्थल हैं। यहाँ से ताम्र उपकरण, मृद्भाण्ड और अन्य अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इन स्थलों की प्राचीन सभ्यता की समृद्धि को दर्शाते हैं।

10. साबणिया, पूंगल (बीकानेर)

साबणिया और पूंगल, जो बीकानेर जिले में स्थित हैं, एक प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। यहाँ के उत्खनन से ताम्र उपकरण और मृद्भाण्ड प्राप्त हुए हैं।

11. एलाना (जालौर)

एलाना, जो जालौर जिले में स्थित है, भी ताम्र पाषाण युग के एक महत्वपूर्ण स्थल के रूप में जाना जाता है। यहाँ से ताम्रधातु और अन्य सांस्कृतिक सामग्री प्राप्त हुई हैं।

12. कुराड़ा (नागौर)

कुराड़ा, जो नागौर जिले में स्थित है, ताम्र पाषाण युग का एक प्रमुख स्थल है। यहाँ के उत्खनन से विभिन्न ताम्र उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

13. नंदलालपुर (चाकसू, जयपुर)

नंदलालपुर, जो चाकसू (जयपुर) में स्थित है, एक और प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ से ताम्रधातु के उपकरण और अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं।

14. पिण्डपाडलिया (चित्तौड़)

पिण्डपाडलिया, जो चित्तौड़ जिले में स्थित है, ताम्र पाषाण युग के एक प्रमुख स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ से ताम्र उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता को दर्शाते हैं।

15. ओझियाना (भीलवाड़ा)

ओझियाना, जो भीलवाड़ा जिले में स्थित है, एक प्रमुख ताम्र पाषाण युगीन स्थल है। यहाँ से ताम्रधातु के उपकरण और मृद्भाण्ड के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो प्राचीन सभ्यता की समृद्धि को दर्शाते हैं।

16. बूढा पुष्कर (अजमेर)

बूढा पुष्कर, जो अजमेर जिले में स्थित है, ताम्र पाषाण युग के महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। यहाँ से ताम्र उपकरण और अन्य सांस्कृतिक अवशेष प्राप्त हुए हैं, जो इस क्षेत्र की प्राचीन सभ्यता की समृद्धि को दर्शाते हैं।



राजस्थान में स्थित ताम्र पाषाण युगीन स्थलों का इतिहास और सांस्कृतिक महत्व अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इन स्थलों से प्राप्त अवशेष, जैसे ताम्रधातु के उपकरण, मृद्भाण्ड और अन्य सांस्कृतिक सामग्री, हमें प्राचीन मानव सभ्यताओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं। राजस्थान की ये ताम्र पाषाण युगीन सभ्यताएँ भारतीय इतिहास और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं और इनका अध्ययन हमारी सांस्कृतिक धरोहर को समझने में मदद करता है।

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