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 आधुनिक राजस्थान: बिजौलिया किसान आंदोलन (1897-1941)

आधुनिक राजस्थान: बिजौलिया किसान आंदोलन (1897-1941)


राजस्थान में किसानों के अधिकारों के लिए लड़ा गया बिजौलिया किसान आंदोलन भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में से एक है। यह आंदोलन न केवल राजस्थान, बल्कि भारत के अन्य हिस्सों में भी किसान आंदोलनों के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरा। इस लेख में हम बिजौलिया किसान आंदोलन के इतिहास, प्रमुख घटनाओं और नेताओं की चर्चा करेंगे।


बिजौलिया और उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

बिजौलिया का क्षेत्र वर्तमान में राजस्थान के मेवाड़ रियासत के अंतर्गत आता था। इसकी स्थापना अशोक परमार द्वारा की गई थी, जो पहले जगनेर में निवास करते थे। राणा सांगा के तहत खानवा के युद्ध में अशोक परमार ने अत्यधिक साहस और वीरता दिखाई थी, जिसके परिणामस्वरूप राणा सांगा ने उन्हें ऊपरमाल की जागीर प्रदान की थी।

बिजौलिया मुख्यतः धाकड़ जाति के किसानों का इलाका था। इस क्षेत्र की जागीरदारी व्यवस्था की जड़ें और सामाजिक संरचनाएँ स्थानीय किसानों पर अत्यधिक बोझ डाल रही थीं।


बिजौलिया में जागीरदारों की भूमिका

1. राव गोविंददास (1894 तक)

सन् 1894 तक बिजौलिया के किसानों को जागीरदार राव गोविंददास से कोई खास शिकायत नहीं थी। उनका शासन किसानों के लिए अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण था।

2. राव कृष्णसिंह (1894-1906)

राव गोविंददास की मृत्यु के बाद, राव कृष्णसिंह ने बिजौलिया की जागीरदारी संभाली। उनकी नीतियों में बदलाव आया, और उन्होंने चंवरी लग (शादी के अवसर पर शुल्क) लागू किया। इसके परिणामस्वरूप किसानों में असंतोष फैल गया। किसानों ने लड़कियों की शादी स्थगित कर दी और कई परिवारों ने पलायन करना शुरू कर दिया।

3. पृथ्वीसिंह (1906-1914)

1906 में राव कृष्णसिंह की मृत्यु के बाद, पृथ्वीसिंह ने सत्ता संभाली। उन्होंने किसानों पर नए कर लगाए, जैसे "तलवार बंधाई" (उत्तराधिकार शुल्क), जो किसानों के लिए असहनीय था। किसानों ने विरोध प्रदर्शन किए, और कई प्रमुख नेताओं ने इसका नेतृत्व किया।


विजय सिंह पथिक का आंदोलन में प्रवेश

1. विजय सिंह पथिक का परिचय

विजय सिंह पथिक, जो पहले भूपसिंह के नाम से प्रसिद्ध थे, का जन्म 1882 में ग्राम गुठावल, जिला बुलंदशहर में हुआ था। वे बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित थे और 1907 में प्रसिद्ध क्रांतिकारी शचीन्द्र सान्याल और राप्त बिहारी बोस के संपर्क में आए।

2. बिजौलिया में उनका प्रवेश और आंदोलन का नेतृत्व

विजय सिंह पथिक ने 1915 में 'विद्या प्रचारिणी सभा' की स्थापना की और इसके माध्यम से उन्होंने बिजौलिया किसान आंदोलन का नेतृत्व किया। 1917 में, उन्होंने 'ऊपरमाल पंच बोर्ड' (किसान पंचायत बोर्ड) का गठन किया और किसानों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष शुरू किया। उनके नेतृत्व में आंदोलन ने बहुत जोर पकड़ा और किसानों के बीच जागरूकता बढ़ी।


बिजौलिया किसान आंदोलन के प्रमुख घटनाक्रम

1. गांधी जी का समर्थन

महात्मा गांधी ने बिजौलिया किसान आंदोलन को नैतिक समर्थन दिया। 1918 में, उन्होंने अपने सचिव महादेव देसाई को बिजौलिया भेजा। इससे किसानों का हौसला बढ़ा और आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।

2. वर्धा और नागपुर अधिवेशन में पथिक जी का योगदान

विजय सिंह पथिक ने 1919 में अमृतसर अधिवेशन और 1920 में नागपुर अधिवेशन में भाग लिया और गांधी जी से मुलाकात की। उन्होंने आंदोलन के उद्देश्यों को राष्ट्रीय मंचों पर रखा, जिससे यह आंदोलन और मजबूत हुआ।

3. साल 1922 में समझौता

1922 में, हालैण्ड समिति ने ठिकाने और किसानों के बीच समझौता कराने की कोशिश की। इसके बावजूद, यह समझौता स्थिर नहीं रहा क्योंकि ठिकानेदार की ईमानदारी पर सवाल उठे। फिर भी, किसानों की संघर्षशीलता ने यह साबित किया कि वे अपने अधिकारों के लिए पूरी तरह से तैयार थे।


आंदोलन का पटाक्षेप और विजय

1. 1941 में समाधान

1941 में टी. विजयाराघवाचार्य के प्रधानमंत्री बनने के बाद, किसानों की समस्याओं का समाधान हुआ। किसानों को अपनी ज़मीनें वापस मिलीं और उनका संघर्ष सफल हुआ। यह भारत के पहले बड़े, संगठित और सफल किसान आंदोलनों में से एक था।

2. महिलाओं की भागीदारी

इस आंदोलन में श्रीमती अंजना देवी चौधरी, जो रामनारायण चौधरी की पत्नी थीं, ने प्रमुख रूप से भाग लिया और महिला सशक्तिकरण के एक उदाहरण के रूप में सामने आईं।



बिजौलिया किसान आंदोलन ने किसानों के अधिकारों के लिए एक बड़ा संघर्ष छेड़ा। इस आंदोलन ने न केवल राजस्थान, बल्कि पूरे भारत में किसानों के आंदोलनों के लिए एक मार्ग प्रशस्त किया। विजय सिंह पथिक और उनके सहकर्मियों की मेहनत और संघर्ष ने साबित किया कि किसानों को उनके अधिकारों के लिए लड़ने का पूरा अधिकार है। यह आंदोलन भारतीय इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ और आज भी प्रेरणा का स्रोत है।


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