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 आधुनिक राजस्थान: 1857 से 1947 तक की प्रमुख घटनाएँ

आधुनिक राजस्थान: 1857 से 1947 तक की प्रमुख घटनाएँ


आधुनिक राजस्थान का इतिहास 1857 से 1947 तक के कालखंड में ब्रिटिश साम्राज्य, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों, और राजनीतिक आंदोलनों का साक्षी रहा। इस समय में राजस्थान के रजवाड़ों, शासकों और उनके निर्णयों ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को प्रभावित किया। इस ब्लॉग में हम राजस्थान के प्रमुख घटनाओं पर चर्चा करेंगे जो इस समय के दौरान हुईं, जैसे कि आन प्रथा, अजमेर दरबार, और अन्य महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ।

1. आन प्रथा महाराणा की सौगंध

आन प्रथा का इतिहास

मेवाड़ के व्यापारी अपने पारस्परिक लेन-देन में एक विशेष प्रथा का पालन करते थे जिसे "आन प्रथा" कहा जाता था। इस प्रथा के तहत, व्यापारी एक दूसरे को अपनी ईमानदारी की गारंटी के रूप में सौगंध लेते थे।

कानूनी मान्यता

महाराणा द्वारा इस प्रथा को कानूनी मान्यता प्रदान की गई थी, जिससे यह प्रथा एक सम्मानित और मान्यता प्राप्त व्यापारिक प्रक्रिया बन गई।

1863 में गैर-कानूनी घोषित होना

1863 में ब्रिटिश शासन ने आन प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया। इसके बाद, 1864 में चम्पालाल के नेतृत्व में इस नियम के खिलाफ एक आम हड़ताल की गई, जो एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम था।

2. अजमेर दरबार - 1870

लॉर्ड मेयो का आगमन

1870 में, लॉर्ड मेयो के राजस्थान आगमन पर अजमेर दरबार का आयोजन किया गया था। यह दरबार ब्रिटिश और भारतीय शासकों के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक खाई को पाटने के उद्देश्य से आयोजित किया गया था।

वित्तीय विकेन्द्रीकरण का जनक

लॉर्ड मेयो को "वित्तीय विकेन्द्रीकरण" का जनक माना जाता है। इसके तहत राजस्थान में वित्तीय व्यवस्था को पुनः व्यवस्थित किया गया।

मेयो कॉलेज की स्थापना

अंग्रेजों और भारतीय शासकों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को सुधारने के उद्देश्य से, मेयो कॉलेज की स्थापना 1875 में की गई। यह कॉलेज आज भी शिक्षा के क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रहा है।

3. प्रिंस अल्बर्ट का जयपुर आगमन (1875)

अल्बर्ट हॉल की नींव

1875 में, प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर रामसिंह द्वितीय ने उनके हाथों से अल्बर्ट हॉल की नींव रखवाई। यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थल था।

अल्वर्ट हॉल का डिज़ाइन

अल्वर्ट हॉल का डिज़ाइन प्रसिद्ध वास्तुविद स्विंटन जैकब ने किया था, और इसका उद्घाटन एडवर्ड ब्रेडफोर्ड द्वारा किया गया।

गुलाबी जयपुर

प्रिंस अल्बर्ट के जयपुर आगमन पर जयपुर को गुलाबी रंग से रंगवा दिया गया था, जो आज भी जयपुर की पहचान है।

4. ब्रिटिश शासक और राजस्थान

1876 में महारानी विक्टोरिया का "कैसर-ए-हिंद" उपाधि ग्रहण

1876 में, महारानी विक्टोरिया ने "कैसर-ए-हिंद" (भारत की साम्राज्ञी) की उपाधि धारण की। यह उपाधि ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार को दर्शाती है।

1877 में दिल्ली दरबार का आयोजन

1877 में, लिटन ने दिल्ली दरबार का आयोजन किया, जिसमें महाराजा रामसिंह को प्रमुख सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया।

1902 में एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक

1902 में, ब्रिटिश शासक एडवर्ड सप्तम का राज्याभिषेक समारोह आयोजित किया गया, जो एक ऐतिहासिक घटना थी।

1911 में दिल्ली दरबार का आयोजन

1911 में, ब्रिटिश शासक जार्ज पंचम और महारानी मैरी ने दिल्ली दरबार का आयोजन किया। इस दरबार में भारतीय शासकों के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संबंधों को और मजबूत किया गया।

5. बीकानेर महाराजा गंगासिंह का योगदान

प्रथम विश्व युद्ध में भागीदारी

बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने प्रथम विश्व युद्ध में अपनी दो सैन्य बटालियनों - गंगा रिसाला और शार्दुल लाइट इन्फेट्री को भेजा। इसके बाद, वे पेरिस शांति सम्मेलन में भी भाग लेने गए।

1930 में साइमन कमीशन

1930 में, साइमन कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया। इन सम्मेलनों के आधार पर 1935 का अधिनियम पारित हुआ। महाराजा गंगासिंह इन तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने वाले प्रमुख भारतीय नेताओं में से एक थे।

चेम्बर ऑफ प्रिंसेज का गठन

गंगासिंह की मांग के आधार पर 1921 में, चेम्बर ऑफ प्रिंसेज या नरेंद्र मंडल का गठन हुआ। यह एक सलाहकार निकाय था, जिसकी अध्यक्षता वायसराय या चांसलर द्वारा की जाती थी। गंगासिंह पहले चांसलर थे।

6. अन्य महत्वपूर्ण घटनाएँ

1927 में बटलर कमेटी

1927 में, बटलर कमेटी का गठन हुआ, जिसमें भारतीय रियासतों और ब्रिटिश शासकों के बीच संबंधों की समीक्षा की गई। इसमें सिडने पील और W.S होल्ड्सवर्थ जैसे महत्वपूर्ण सदस्य शामिल थे।

देशी रियासतों का पक्ष

सर बैसली स्कॉट, जो देशी रियासतों के पक्ष में थे, ने भारतीय शासकों के हितों का समर्थन किया।


1857 से 1947 तक राजस्थान में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, जिन्होंने भारतीय राजनीति और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष को प्रभावित किया। इन घटनाओं ने भारतीय शासकों को न केवल अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा दी, बल्कि उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी अहम भूमिका निभाई। इस समय के दौरान, राजस्थान के शासकों और उनके निर्णयों ने भारतीय राजनीति को नए दिशा में मोड़ा और एक मजबूत स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखी।

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