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राजस्थान के जल संसाधन: परंपरागत स्रोत और अटल भूजल योजना

राजस्थान के जल संसाधन: परंपरागत संरक्षण विधियां और आधुनिक योजनाएं

राजस्थान का भूगोल जल संसाधनों की दृष्टि से चुनौतीपूर्ण रहा है। परंतु परंपरागत जल संरक्षण विधियों और आधुनिक योजनाओं ने इसे संतुलित किया है। यह टॉपिक चतुर्थ श्रेणी GK प्रहार बैच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

👉 यह लेख विशेष रूप से REET, RAS, Patwar, 3rd Grade Teacher और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है।

1. परंपरागत जल संरक्षण के स्रोत

(A) खड़ीन (Khadin)

  • परिभाषा: वर्षा जल को रोककर खेती योग्य मिट्टी तैयार करना।
  • स्थान: पश्चिमी राजस्थान, प्रसिद्ध – जैसलमेर का कुलदरा गाँव
  • शब्दावली: मरहू (सूखने के बाद बची मिट्टी), खड़ीन कृषि।

(B) टांका (Tanka)

  • परिभाषा: भूमिगत जल कुंड।
  • अन्य नाम: होद / होज।
  • स्थान: बाड़मेर, जैसलमेर।
  • उपयोग: पेयजल हेतु।

(C) नाड़ी (Nadi)

  • गांव के बाहर जल संचयन हेतु तालाब।
  • 1520 में राव जोधा द्वारा प्रथम निर्माण।
  • शेखावाटी में पक्के रूप में पाए जाते हैं।

(D) टोबा (Toba)

  • स्थान: शेखावाटी।
  • उपयोग: पशुओं के पेयजल हेतु।
  • लोक कहावत: “बनाओ टोबा, पाओ डोबा”।

(E) कुई (Kui) या बेरी (Beri)

  • स्थान: बीकानेर व जैसलमेर।
  • विशेषता: तालाब से रिसकर पानी लंबे समय तक संरक्षित रहता है।

(F) जोहड़ (Johad)

  • स्थान: शेखावाटी।
  • गहरा भाग “चोबी” कहलाता है।

(G) पालर पानी (Palar Pani)

वर्षा जल को एकत्रित करना। प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रमुख प्रश्न।

2. राजस्थान की प्रमुख बावड़ियाँ

  • चांद बावड़ी – आभानेरी (दौसा), 19.5 मीटर गहरी, 3500 सीढ़ियाँ।
  • रानी जी की बावड़ी – बूंदी, “बावड़ियों का सिरमोर”।
  • नौलखा बावड़ी – डूंगरपुर (1586)।
  • चमना बावड़ी – शाहपुरा (1858)।
  • त्रिमुखी बावड़ी – उदयपुर।
  • अनारकली की बावड़ी – बूंदी।

अन्य: दूध बावड़ी (सिरोही), पन्ना मीणा की बावड़ी (जयपुर), खातन बावड़ी (चित्तौड़गढ़), लवाण बावड़ी (दौसा)।

3. अटल भूजल योजना (Atal Bhujal Yojana)

  • लागू: 1 अप्रैल 2020
  • सहयोग: भारत सरकार + विश्व बैंक (50-50)
  • अवधि: 2020-21 से 2024-25
  • राजस्थान बजट: ₹1189.65 करोड़
  • कवरेज: 16 जिले, 38 पंचायत समितियाँ, 1129 ग्राम पंचायतें

4. शैक्षणिक संसाधन

  • स्रोत: RJ NEWS (rjnewsjpr.net)
  • Telegram चैनल: RJ NEWS EDUCATION HUB
  • सिलेबस: कोई बदलाव नहीं, केवल अंकों का वेटेज बदला।
निष्कर्ष: राजस्थान के परंपरागत जल संसाधन जैसे खड़ीन, टांका, नाड़ी और बावड़ियाँ आज भी जल संरक्षण का आधार हैं। आधुनिक योजनाएँ जैसे अटल भूजल योजना जल संकट से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) – राजस्थान के जल संसाधन

खड़ीन क्या है और यह कहाँ प्रसिद्ध है?

खड़ीन वर्षा जल को बाँधकर खेत के रूप में उपयोग करने की परंपरागत पद्धति है। यह पश्चिमी राजस्थान, विशेषकर जैसलमेर के कुलदरा क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

टांका (Tanka) का उपयोग किस लिए होता है?

टांका भूमिगत जल कुंड होता है जो वर्षा जल संचयन के लिए बनाया जाता है। इसका मुख्य उपयोग पेयजल आपूर्ति में होता है।

नाड़ी और जोहड़ में क्या अंतर है?

नाड़ी गांव के बाहर जल संचयन हेतु बना तालाब है (शेखावाटी में प्रायः पक्के), जबकि जोहड़ वर्षा जल रोकने की परंपरागत संरचना है जिसका सबसे गहरा भाग “चोबी” कहलाता है।

टोबा किस क्षेत्र में अधिक मिलता है और इसका उद्देश्य क्या है?

टोबा शेखावाटी क्षेत्र में अधिक मिलता है और इसका उपयोग पशुओं के पेयजल हेतु किया जाता है।

कुई/बेरी कैसे काम करती है?

तालाब के पास 10–12 मीटर गहरी कुई/बेरी खोदी जाती है जिसमें तालाब का पानी रिसकर जमा होता रहता है, जिससे लंबे समय तक मीठा पानी उपलब्ध रहता है।

बूंदी को “City of Stepwells” क्यों कहते हैं?

बूंदी में ऐतिहासिक बावड़ियों की संख्या व वैभव अधिक है, जैसे रानी जी की बावड़ी, इसलिए इसे स्टेप वेल्स का शहर कहा जाता है।

चांद बावड़ी की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

आभानेरी (दौसा) स्थित चांद बावड़ी लगभग 19.5 मीटर गहरी है, इसमें 3500 से अधिक सीढ़ियाँ हैं और यह 8वीं सदी में बनवाई गई थी।

अटल भूजल योजना कब शुरू हुई और इसकी भागीदारी क्या है?

यह योजना 1 अप्रैल 2020 को शुरू हुई। भारत सरकार और विश्व बैंक की 50–50 भागीदारी है और अवधि 2020–21 से 2024–25 तक है।

राजस्थान में इस योजना का कवरेज व बजट क्या है?

राजस्थान में 16 जिले, 38 पंचायत समितियाँ और 1129 ग्राम पंचायतें शामिल की गईं; कुल अनुमानित बजट ₹1189.65 करोड़ है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण टॉपिक कौन-कौन से हैं?

खड़ीन, टांका, नाड़ी, टोबा, जोहड़, चांद बावड़ी, रानी जी की बावड़ी और अटल भूजल योजना—ये सभी Rajasthan GK के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

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